आसीदसौ तत्र न कोऽपि भूप-
स्तन्मूर्तिरूपोद्भवदद्भुतस्य ।
उल्लेसुरङ्गानि मुदा न यस्य
विनद्ररोमाङ्कुरदन्तुराणि ॥
आसीदसौ तत्र न कोऽपि भूप-
स्तन्मूर्तिरूपोद्भवदद्भुतस्य ।
उल्लेसुरङ्गानि मुदा न यस्य
विनद्ररोमाङ्कुरदन्तुराणि ॥
स्तन्मूर्तिरूपोद्भवदद्भुतस्य ।
उल्लेसुरङ्गानि मुदा न यस्य
विनद्ररोमाङ्कुरदन्तुराणि ॥
अन्वयः
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तत्र असौ कः अपि भूपः न आसीत्, यस्य अङ्गानि तत् मूर्ति रूप उद्भवत् अद्भुतस्य (अनुभवात्) मुदा विनद्र रोमाङ्कुर दन्तुराणि (भूत्वा) न उल्लेसुः ।
Summary
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There was not a single king there whose limbs, bristling with prominent sprouts of hair due to the wonder arising from her form and beauty, did not shine with joy. (Meaning, every king experienced horripilation out of joyous wonder).
पदच्छेदः
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| आसीत् | आसीत् (√अस् कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | was |
| असौ | अदस् (१.१) | that |
| तत्र | तत्र | there |
| न | न | not |
| कः | किम् (१.१) | who |
| अपि | अपि | even |
| भूपः | भूप (१.१) | king |
| तन्मूर्तिरूपोद्भवदद्भुतस्य | तद्–मूर्ति–रूप–उद्भवत् (उद्√भू+शतृ)–अद्भुत (६.१) | of the wonder arising from her form and beauty |
| उल्लेसुरङ्गानि | उल्लेसुर (उद्√लस् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.)–अङ्ग (१.३) | limbs shone |
| मुदा | मुद् (३.१) | with joy |
| न | न | not |
| यस्य | यद् (६.१) | whose |
| विनद्ररोमाङ्कुरदन्तुराणि | विनद्र (वि√नद्+र)–रोम–अङ्कुर–दन्तुर (१.३) | bristling with prominent sprouts of hair |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| आ | सी | द | सौ | त | त्र | न | को | ऽपि | भू | प |
| स्त | न्मू | र्ति | रू | पो | द्भ | व | द | द्भु | त | स्य |
| उ | ल्ले | सु | र | ङ्गा | नि | मु | दा | न | य | स्य |
| वि | न | द्र | रो | मा | ङ्कु | र | द | न्तु | रा | णि |
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