गता यदुत्सङ्गतले विशालतां
द्रुमाः शिरोभिः फलगौरवेण ताम् ।
कथं न धात्रीमतिमात्रनामितैः
स वन्दमानानभिनन्दति स्म तान् ॥
गता यदुत्सङ्गतले विशालतां
द्रुमाः शिरोभिः फलगौरवेण ताम् ।
कथं न धात्रीमतिमात्रनामितैः
स वन्दमानानभिनन्दति स्म तान् ॥
द्रुमाः शिरोभिः फलगौरवेण ताम् ।
कथं न धात्रीमतिमात्रनामितैः
स वन्दमानानभिनन्दति स्म तान् ॥
अन्वयः
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यत् द्रुमाः (अस्याः) उत्सङ्गतले विशालतां गताः, (ते) फलगौरवेण अतिमात्रनामितैः शिरोभिः तां धात्रीं वन्दमानान् (इव स्थितान्) तान् (द्रुमान्) सः कथं न अभिनन्दति स्म?
Summary
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Since the trees had grown to greatness on the lap of the earth, how could Nala not welcome them as they seemed to be saluting that very mother earth, with their tops extremely bent from the weight of their fruits?
पदच्छेदः
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| गताः | गत (√गम्+क्त, १.३) | having attained |
| यत् | यत् | since |
| उत्सङ्गतले | उत्सङ्ग–तल (७.१) | on the lap |
| विशालताम् | विशालता (२.१) | greatness |
| द्रुमाः | द्रुम (१.३) | the trees |
| शिरोभिः | शिरस् (३.३) | with their heads (tops) |
| फलगौरवेण | फल–गौरव (३.१) | due to the weight of the fruits |
| ताम् | तद् (२.१) | that |
| कथम् | कथम् | how |
| न | न | not |
| धात्रीम् | धात्री (२.१) | the earth / mother |
| अतिमात्रनामितैः | अतिमात्र–नामित (√नम्+णिच्+क्त, ३.३) | extremely bent |
| सः | तद् (१.१) | He (Nala) |
| वन्दमानान् | वन्दमान (√वन्द्+शानच्, २.३) | bowing / saluting |
| अभिनन्दति | अभिनन्दति (अभि√नन्द् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | welcomed |
| स्म | स्म | (makes past tense) |
| तान् | तद् (२.३) | them (the trees) |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ग | ता | य | दु | त्स | ङ्ग | त | ले | वि | शा | ल | तां |
| द्रु | माः | शि | रो | भिः | फ | ल | गौ | र | वे | ण | ताम् |
| क | थं | न | धा | त्री | म | ति | मा | त्र | ना | मि | तैः |
| स | व | न्द | मा | ना | न | भि | न | न्द | ति | स्म | तान् |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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