पुरा हठाक्षिप्ततुषारपाण्डुर-
च्छदावृतेर्वीरुधि बद्धविभ्रमाः ।
मिलत्रिमीलं ससृजुर्विलोकिता
नभस्वतस्तं कुसुमेषु केलयः ॥
पुरा हठाक्षिप्ततुषारपाण्डुर-
च्छदावृतेर्वीरुधि बद्धविभ्रमाः ।
मिलत्रिमीलं ससृजुर्विलोकिता
नभस्वतस्तं कुसुमेषु केलयः ॥
च्छदावृतेर्वीरुधि बद्धविभ्रमाः ।
मिलत्रिमीलं ससृजुर्विलोकिता
नभस्वतस्तं कुसुमेषु केलयः ॥
अन्वयः
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पुरा हठाक्षिप्ततुषारपाण्डुरच्छदावृते वीरुधि कुसुमेषु बद्धविभ्रमाः नभस्वतः केलयः विलोकिताः (सन्तः) तं मिलन्निमीलं ससृजुः ।
Summary
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The playful movements of the wind among the flowers of a creeper—covered in leaves as white as scattered snow—created a delusion. As Nala watched, these movements caused him to repeatedly open and close his eyes.
पदच्छेदः
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| पुरा | पुरा | formerly |
| हठाक्षिप्ततुषारपाण्डुरच्छदावृते | हठ–आक्षिप्त (आ√क्षिप्+क्त)–तुषार–पाण्डुर–छद–आवृत (आ√वृ+क्त, ७.१) | on the one covered with leaves pale like forcefully scattered snow |
| वीरुधि | वीरुध् (७.१) | on the creeper |
| बद्धविभ्रमाः | बद्ध (√बन्ध्+क्त)–विभ्रम (१.३) | having created a delusion |
| मिलन्निमीलं | मिलत् (√मील्+शतृ)–निमीलम् | opening and closing |
| ससृजुः | ससृजुः (√सृज् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | caused |
| विलोकिताः | विलोकित (वि√लोक्+क्त, १.३) | being seen |
| नभस्वतः | नभस्वत् (६.१) | of the wind |
| तम् | तद् (२.१) | him (Nala) |
| कुसुमेषु | कुसुम (७.३) | among the flowers |
| केलयः | केलि (१.३) | playful movements |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| पु | रा | ह | ठा | क्षि | प्त | तु | षा | र | पा | ण्डु | र |
| च्छ | दा | वृ | ते | र्वी | रु | धि | ब | द्ध | वि | भ्र | माः |
| मि | ल | त्रि | मी | लं | स | सृ | जु | र्वि | लो | कि | ता |
| न | भ | स्व | त | स्तं | कु | सु | मे | षु | के | ल | यः |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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