तदङ्गमुद्दिश्य सुगन्धि पातुकाः
शिलीमुखालीः कुसुमाद्गुणस्पृशः ।
स्वचापदुर्निर्गतमार्गणभ्रमा-
त्स्मरः स्वनन्तीरवलोक्य लज्जितः ॥
तदङ्गमुद्दिश्य सुगन्धि पातुकाः
शिलीमुखालीः कुसुमाद्गुणस्पृशः ।
स्वचापदुर्निर्गतमार्गणभ्रमा-
त्स्मरः स्वनन्तीरवलोक्य लज्जितः ॥
शिलीमुखालीः कुसुमाद्गुणस्पृशः ।
स्वचापदुर्निर्गतमार्गणभ्रमा-
त्स्मरः स्वनन्तीरवलोक्य लज्जितः ॥
अन्वयः
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स्मरः सुगन्धि तत् अङ्गम् उद्दिश्य, कुसुमात् गुणस्पृशः, पातुकाः, स्वनन्तीः शिलीमुखालीः, स्वचापदुर्निर्गतमार्गणभ्रमात् अवलोक्य लज्जितः (अभवत्) ।
Summary
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Kama, aiming at Damayanti's fragrant body, saw buzzing rows of bees eager for nectar, touching the flower stalk. Mistaking them for arrows wrongly shot from his own bow, he became ashamed.
पदच्छेदः
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| तत् | तद् (२.१) | that |
| अङ्गम् | अङ्ग (२.१) | body (of Damayanti) |
| उद्दिश्य | उद्दिश्य (उत्√दिश्+ल्यप्) | aiming at |
| सुगन्धि | सुगन्धिन् (२.१) | fragrant |
| पातुकाः | पातुका (√पा+उक, २.३) | eager to drink |
| शिलीमुखालीः | शिलीमुख–आलि (२.३) | rows of bees |
| कुसुमात् | कुसुम (५.१) | from the flower |
| गुणस्पृशः | गुण–स्पृश् (२.३) | touching the string (stalk) |
| स्वचापदुर्निर्गतमार्गणभ्रमात् | स्व–चाप–दुर्निर्गत–मार्गण–भ्रम (५.१) | from the delusion of arrows wrongly shot from his own bow |
| स्मरः | स्मर (१.१) | Kama (the god of love) |
| स्वनन्तीः | स्वनन्ती (√स्वन्+शतृ+ङीप्, २.३) | buzzing |
| अवलोक्य | अवलोक्य (अव√लोक्+ल्यप्) | having seen |
| लज्जितः | लज्जित (√लज्ज्+क्त, १.१) | was ashamed |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | द | ङ्ग | मु | द्दि | श्य | सु | ग | न्धि | पा | तु | काः |
| शि | ली | मु | खा | लीः | कु | सु | मा | द्गु | ण | स्पृ | शः |
| स्व | चा | प | दु | र्नि | र्ग | त | मा | र्ग | ण | भ्र | मा |
| त्स्म | रः | स्व | न | न्ती | र | व | लो | क्य | ल | ज्जि | तः |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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