गलत्परागं भ्रमिभङ्गिभिः पत-
त्प्रसक्तभृङ्गावलि नागकेसरम् ।
स मारनाराचनिघर्षणस्खल-
ज्ज्वलत्कणं शाणमिव व्यलोकयत् ॥
गलत्परागं भ्रमिभङ्गिभिः पत-
त्प्रसक्तभृङ्गावलि नागकेसरम् ।
स मारनाराचनिघर्षणस्खल-
ज्ज्वलत्कणं शाणमिव व्यलोकयत् ॥
त्प्रसक्तभृङ्गावलि नागकेसरम् ।
स मारनाराचनिघर्षणस्खल-
ज्ज्वलत्कणं शाणमिव व्यलोकयत् ॥
अन्वयः
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सः भ्रमिभङ्गिभिः पतत्, गलत्परागं, प्रसक्तभृङ्गावलि नागकेसरं, मारनाराचनिघर्षणस्खलज्ज्वलत्कणम् शाणम् इव व्यलोकयत् ।
Summary
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Nala saw a Nagakesara flower, from which pollen was falling due to its whirling movements and to which a line of bees clung. He perceived it as a whetstone from which brilliant sparks flew due to the sharpening of the arrows of Kama, the god of love.
पदच्छेदः
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| गलत्परागम् | गलत् (√गल्+शतृ)–पराग (२.१) | with pollen falling off |
| भ्रमिभङ्गिभिः | भ्रमि–भङ्गि (३.३) | with whirling movements |
| पतत् | पतत् (√पत्+शतृ, २.१) | falling |
| प्रसक्तभृङ्गावलि | प्रसक्त (प्र√सज्+क्त)–भृङ्ग–आवलि (२.१) | to which a line of bees was attached |
| नागकेसरम् | नागकेसर (२.१) | the Nagakesara flower |
| सः | तद् (१.१) | He (Nala) |
| मारनाराचनिघर्षणस्खलज्ज्वलत्कणम् | मार–नाराच–निघर्षण–स्खलत् (√स्खल्+शतृ)–ज्वलत् (√ज्वल्+शतृ)–कण (२.१) | from which brilliant sparks were falling off due to the sharpening of Kama's arrows |
| शाणम् | शाण (२.१) | a whetstone |
| इव | इव | like |
| व्यलोकयत् | व्यलोकयत् (वि+अव√लोक् +णिच् कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | saw |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ग | ल | त्प | रा | गं | भ्र | मि | भ | ङ्गि | भिः | प | त |
| त्प्र | स | क्त | भृ | ङ्गा | व | लि | ना | ग | के | स | रम् |
| स | मा | र | ना | रा | च | नि | घ | र्ष | ण | स्ख | ल |
| ज्ज्व | ल | त्क | णं | शा | ण | मि | व | व्य | लो | क | यत् |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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