दिने दिने त्वं तनुरेधि रेऽधिकं
पुनः पुनर्मूर्च्छ च तापमृच्छ च ।
इतीव पान्थाञ्शपतः पिकान्द्विजा-
न्सखेदमैक्षिष्ट स लोहितेक्षणान् ॥
दिने दिने त्वं तनुरेधि रेऽधिकं
पुनः पुनर्मूर्च्छ च तापमृच्छ च ।
इतीव पान्थाञ्शपतः पिकान्द्विजा-
न्सखेदमैक्षिष्ट स लोहितेक्षणान् ॥
पुनः पुनर्मूर्च्छ च तापमृच्छ च ।
इतीव पान्थाञ्शपतः पिकान्द्विजा-
न्सखेदमैक्षिष्ट स लोहितेक्षणान् ॥
अन्वयः
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सः "रे (पान्थ), त्वम् दिने दिने अधिकम् तनुः एधि, पुनः पुनः मूर्च्छ च, तापम् ऋच्छ च" इति इव पान्थान् शपतः लोहित-ईक्षणान् पिकान् द्विजान् स-खेदम् ऐक्षिष्ट ।
Summary
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He sorrowfully looked at the red-eyed cuckoos, who seemed to be cursing the travellers, as if saying: "O traveller, may you become thinner day by day! May you faint again and again, and may you attain ever more suffering!"
पदच्छेदः
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| दिने दिने | दिन (७.१)–दिन (७.१) | day by day |
| त्वम् | युष्मद् (१.१) | you |
| तनुः | तनु (१.१) | thin |
| एधि | एधि (√अस् कर्तरि लोट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | become! |
| रे | रे | O! |
| अधिकम् | अधिकम् | more |
| पुनः पुनः | पुनर्–पुनर् | again and again |
| मूर्च्छ | मूर्च्छ (√मूर्च्छ् कर्तरि लोट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | faint! |
| च | च | and |
| तापम् | ताप (२.१) | suffering |
| ऋच्छ | ऋच्छ (√ऋ कर्तरि लोट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | get! |
| च | च | and |
| इति | इति | thus |
| इव | इव | as if |
| पान्थान् | पान्थ (२.३) | the travellers |
| शपतः | शपत् (√शप्+शतृ, २.३) | cursing |
| पिकान् | पिक (२.३) | the cuckoos |
| द्विजान् | द्विज (२.३) | the birds |
| सखेदम् | सखेदम् | with sorrow |
| ऐक्षिष्ट | ऐक्षिष्ट (√ईक्ष् कर्तरि लुङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | he saw |
| सः | तद् (१.१) | he |
| लोहितेक्षणान् | लोहित–ईक्षण (२.३) | red-eyed |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| दि | ने | दि | ने | त्वं | त | नु | रे | धि | रे | ऽधि | कं |
| पु | नः | पु | न | र्मू | र्च्छ | च | ता | प | मृ | च्छ | च |
| इ | ती | व | पा | न्था | ञ्श | प | तः | पि | का | न्द्वि | जा |
| न्स | खे | द | मै | क्षि | ष्ट | स | लो | हि | ते | क्ष | णान् |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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