अमन्यतासौ कुसुमेषुगर्भगं
परागमन्धंकरणं वियोगिनाम् ।
स्मरेण मुक्तेषु पुरा पुरारये
तदङ्गभस्मेव शरेषु संगतम् ॥
अमन्यतासौ कुसुमेषुगर्भगं
परागमन्धंकरणं वियोगिनाम् ।
स्मरेण मुक्तेषु पुरा पुरारये
तदङ्गभस्मेव शरेषु संगतम् ॥
परागमन्धंकरणं वियोगिनाम् ।
स्मरेण मुक्तेषु पुरा पुरारये
तदङ्गभस्मेव शरेषु संगतम् ॥
अन्वयः
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असौ वियोगिनाम् अन्धंकरणम् कुसुम-इषु-गर्भ-गम् परागम्, पुरा पुर-अये स्मरेण मुक्तेषु शरेषु संगतम् तत्-अङ्ग-भस्म इव, अमन्यत ।
Summary
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He considered the pollen within the flower-arrows, which blinds separated lovers, to be like the ash from Kamadeva's own body. He imagined this ash had stuck to the arrows that Kamadeva had formerly shot at Shiva, just before being incinerated himself.
पदच्छेदः
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| अमन्यत | अमन्यत (√मन् कर्तरि लङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | he thought |
| असौ | अदस् (१.१) | he |
| कुसुम | कुसुम | flower |
| इषु | इषु | arrows' |
| गर्भ | गर्भ | inside |
| गम् | गम् (२.१) | residing |
| परागम् | पराग (२.१) | the pollen |
| अन्धंकरणम् | अन्धम्–करण (२.१) | blinding |
| वियोगिनाम् | वियोगिन् (६.३) | of separated lovers |
| स्मरेण | स्मर (३.१) | by Kama |
| मुक्तेषु | मुक्त (√मुच्+क्त, ७.३) | on the released |
| पुरा | पुरा | formerly |
| पुरारये | पुर–अरि (४.१) | at Shiva |
| तदङ्गभस्म | तद्–अङ्ग–भस्म (१.१) | the ash of his (Kama's) body |
| इव | इव | like |
| शरेषु | शर (७.३) | on the arrows |
| संगतम् | संगत (सम्√गम्+क्त, १.१) | stuck |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | म | न्य | ता | सौ | कु | सु | मे | षु | ग | र्भ | गं |
| प | रा | ग | म | न्धं | क | र | णं | वि | यो | गि | नाम् |
| स्म | रे | ण | मु | क्ते | षु | पु | रा | पु | रा | र | ये |
| त | द | ङ्ग | भ | स्मे | व | श | रे | षु | सं | ग | तम् |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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