विचिन्वतीः पान्थपतङ्गहिंसनै-
रपुण्यकर्माण्यलिकज्जलच्छलात् ।
व्यलोकयच्चम्पककोरकावलीः
स शम्बरारेर्बलिदीपिका इव ॥
विचिन्वतीः पान्थपतङ्गहिंसनै-
रपुण्यकर्माण्यलिकज्जलच्छलात् ।
व्यलोकयच्चम्पककोरकावलीः
स शम्बरारेर्बलिदीपिका इव ॥
रपुण्यकर्माण्यलिकज्जलच्छलात् ।
व्यलोकयच्चम्पककोरकावलीः
स शम्बरारेर्बलिदीपिका इव ॥
अन्वयः
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सः अलि-कज्जल-च्छलात् पान्थ-पतङ्ग-हिंसनैः अपुण्य-कर्माणि विचिन्वतीः शम्बर-अरेः बलि-दीपिकाः इव चम्पक-कोरक-आवलीः व्यलोकयत् ।
Summary
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He looked at the rows of Champaka buds, which appeared like sacrificial lamps offered to Kamadeva. Under the pretext of being black soot (which were actually bees), these 'lamps' seemed to accumulate sins by harming the traveller-moths drawn to their flame-like beauty.
पदच्छेदः
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| विचिन्वतीः | विचिन्वत् (वि√चि+शतृ, २.३) | accumulating |
| पान्थ | पान्थ | traveller |
| पतङ्ग | पतङ्ग | moths |
| हिंसनैः | हिंसन (३.३) | by the acts of harming |
| अपुण्यकर्माणि | अपुण्य–कर्मन् (२.३) | sinful deeds |
| अलि | अलि | of bees |
| कज्जल | कज्जल | soot |
| च्छलात् | छल (५.१) | under the pretext |
| व्यलोकयत् | व्यलोकयत् (वि+अव√लोक् कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | he observed |
| चम्पककोरकावलीः | चम्पक–कोरक–आवली (२.३) | rows of Champaka buds |
| सः | तद् (१.१) | he |
| शम्बरारेः | शम्बर–अरि (६.१) | of Kamadeva |
| बलिदीपिकाः | बलि–दीपिका (२.३) | sacrificial lamps |
| इव | इव | like |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वि | चि | न्व | तीः | पा | न्थ | प | त | ङ्ग | हिं | स | नै |
| र | पु | ण्य | क | र्मा | ण्य | लि | क | ज्ज | ल | च्छ | लात् |
| व्य | लो | क | य | च्च | म्प | क | को | र | का | व | लीः |
| स | श | म्ब | रा | रे | र्ब | लि | दी | पि | का | इ | व |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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