धनुर्मधुस्विन्नकरोऽपि भीमजा-
परं परागैस्तव धूलिहस्तयन्
प्रसूनधन्वा शरसात्करोति
मामिति क्रुधाक्रुश्यत तेन कैतक्-
अम्
धनुर्मधुस्विन्नकरोऽपि भीमजा-
परं परागैस्तव धूलिहस्तयन्
प्रसूनधन्वा शरसात्करोति
मामिति क्रुधाक्रुश्यत तेन कैतक्-
अम्
परं परागैस्तव धूलिहस्तयन्
प्रसूनधन्वा शरसात्करोति
मामिति क्रुधाक्रुश्यत तेन कैतक्-
अम्
अन्वयः
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दशा-विपाकम् कृच्छ्रम् गतः अपि (तव) त्वदीयम् चेतः धर्मात् न स्खलतु । पुण्यम् अमुञ्चतः अनन्य-भक्तेः (तव) त्रि-वर्गः स्व-हस्त-वास्तव्यः इव (भविष्यति) ।
Summary
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Yama's boon continued: "Even when you have fallen into hardship due to the turn of fate, may your mind not swerve from righteousness. For one who does not abandon merit and has unwavering devotion, the three aims of life will be as if residing in his own hand."
पदच्छेदः
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| कृच्छ्रम् | कृच्छ्र (२.१) | hardship |
| गतस्य | गत (√गम्+क्त, ६.१) | of one who has gone |
| अपि | अपि | even |
| दशाविपाकम् | दशा–विपाक (२.१) | the consequence of fate |
| धर्मात् | धर्म (५.१) | from righteousness |
| न | न | not |
| चेतः | चेतस् (१.१) | mind |
| स्खलतु | स्खलतु (√स्खल् कर्तरि लोट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | may it swerve |
| त्वदीयम् | त्वदीय (१.१) | your |
| अमुञ्चतः | अमुञ्चत् (√मुच्+नञ्+शतृ, ६.१) | of one not abandoning |
| पुण्यम् | पुण्य (२.१) | merit |
| अनन्यभक्तेः | अनन्यभक्ति (६.१) | of one with unwavering devotion |
| स्वहस्तवास्तव्यः | स्वहस्तवास्तव्य (१.१) | residing in one's own hand |
| इव | इव | like |
| त्रिवर्गः | त्रिवर्ग (१.१) | the group of three |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ध | नु | र्म | धु | स्वि | न्न | क | रो | ऽपि | भी | म | जा |
| प | रं | प | रा | गै | स्त | व | धू | लि | ह | स्त | यन् |
| प्र | सू | न | ध | न्वा | श | र | सा | त्क | रो | ति | मा |
| मि | ति | क्रु | धा | क्रु | श्य | त | ते | न | कै | त | कम् |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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