यदस्य यात्रासु बलोद्धतं रजः
स्फुरत्प्रतापानलघूममञ्जिम ।
तदेव गत्वा पतितं सुधाम्बुधौ
दधाति पङ्कीभवदङ्कतां विधौ ॥
यदस्य यात्रासु बलोद्धतं रजः
स्फुरत्प्रतापानलघूममञ्जिम ।
तदेव गत्वा पतितं सुधाम्बुधौ
दधाति पङ्कीभवदङ्कतां विधौ ॥
स्फुरत्प्रतापानलघूममञ्जिम ।
तदेव गत्वा पतितं सुधाम्बुधौ
दधाति पङ्कीभवदङ्कतां विधौ ॥
अन्वयः
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अस्य यात्रासु यत् बल-उद्धतम् रजः स्फुरत्-प्रताप-अनल-धूम-मञ्जिम (आसीत्), तत् एव सुधाम्बुधौ गत्वा पतितम् (सत्) विधौ पङ्कीभवत्-अङ्कताम् दधाति ।
Summary
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The dust raised by his army during his campaigns, which had the beauty of smoke from the blazing fire of his valor, upon reaching and falling into the ocean of nectar (the sky), becomes the mud-like spot on the moon.
पदच्छेदः
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| यत् | यद् (१.१) | which |
| अस्य | इदम् (६.१) | his |
| यात्रासु | यात्रा (७.३) | during campaigns |
| बलोद्धतम् | बल–उद्धत (१.१) | raised by the army |
| रजः | रजस् (१.१) | dust |
| स्फुरत्प्रतापानलधूममञ्जिम | स्फुरत् (√स्फुर्+शतृ)–प्रताप–अनल–धूम–मञ्जिमन् (१.१) | which had the beauty of smoke from the blazing fire of his valor |
| तत् | तद् (१.१) | that very |
| एव | एव | indeed |
| गत्वा | गत्वा (√गम्+क्त्वा) | having gone |
| पतितम् | पतित (√पत्+क्त, १.१) | having fallen |
| सुधाम्बुधौ | सुधा–अम्बुधि (७.१) | into the ocean of nectar (sky) |
| दधाति | दधाति (√धा कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | assumes |
| पङ्कीभवदङ्कताम् | पङ्कीभवत्–अङ्कता (२.१) | the state of being a mud-like spot |
| विधौ | विधि (७.१) | on the moon |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| य | द | स्य | या | त्रा | सु | ब | लो | द्ध | तं | र | जः |
| स्फु | र | त्प्र | ता | पा | न | ल | घू | म | म | ञ्जि | म |
| त | दे | व | ग | त्वा | प | ति | तं | सु | धा | म्बु | धौ |
| द | धा | ति | प | ङ्की | भ | व | द | ङ्क | तां | वि | धौ |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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