वियोगभाजां हृदि कण्टकैः कटु-
र्निधीयसे कर्णिशरः स्मरेण यत् ।
ततो दुराकर्षतया तदन्तकृ-
द्विगीयसे मन्मथदेहदाहिना ॥
वियोगभाजां हृदि कण्टकैः कटु-
र्निधीयसे कर्णिशरः स्मरेण यत् ।
ततो दुराकर्षतया तदन्तकृ-
द्विगीयसे मन्मथदेहदाहिना ॥
र्निधीयसे कर्णिशरः स्मरेण यत् ।
ततो दुराकर्षतया तदन्तकृ-
द्विगीयसे मन्मथदेहदाहिना ॥
अन्वयः
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(हे केतक!) यत् स्मरेण वियोग-भाजाम् हृदि कण्टकैः कटुः कर्णिशरः (त्वम्) निधीयसे, ततः दुराकर्षतया तत्-अन्त-कृत् (त्वम्) मन्मथ-देह-दाहिना विगीयसे।
Summary
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(Addressing the Ketaki flower) "Because you are placed by Kama as a painful, barbed arrow with thorns in the hearts of separated lovers, you are difficult to pull out and thus cause their death. Therefore, you are censured by Shiva, the one who burned Kama's body."
पदच्छेदः
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| वियोगभाजाम् | वियोग–भाज् (६.३) | of those experiencing separation |
| हृदि | हृद् (७.१) | in the heart |
| कण्टकैः | कण्टक (३.३) | with thorns |
| कटुः | कटु (१.१) | painful |
| निधीयसे | निधीयसे (नि√धा भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) म.पु. एक.) | you are placed |
| कर्णिशरः | कर्णिशर (१.१) | a barbed arrow |
| स्मरेण | स्मर (३.१) | by Kama |
| यत् | यत् | because |
| ततः | ततः | therefore |
| दुराकर्षतया | दुराकर्षता (३.१) | due to being difficult to pull out |
| तदन्तकृत् | तत्–अन्त–कृत् (१.१) | one who brings an end to that (life) |
| विगीयसे | विगीयसे (वि√गै भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) म.पु. एक.) | you are censured |
| मन्मथदेहदाहिना | मन्मथ–देह–दाहिन् (३.१) | by the burner of Manmatha's body (Shiva) |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वि | यो | ग | भा | जां | हृ | दि | क | ण्ट | कैः | क | टु |
| र्नि | धी | य | से | क | र्णि | श | रः | स्म | रे | ण | यत् |
| त | तो | दु | रा | क | र्ष | त | या | त | द | न्त | कृ |
| द्वि | गी | य | से | म | न्म | थ | दे | ह | दा | हि | ना |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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