विनिद्रपत्रालिगतालिकैतवा-
न्मृगाङ्कचूडामणिवर्जनार्जितम् ।
दधानमाशासु चरिष्णु दुर्यशः
स कौतुकी तत्र ददर्श केतकम् ॥
विनिद्रपत्रालिगतालिकैतवा-
न्मृगाङ्कचूडामणिवर्जनार्जितम् ।
दधानमाशासु चरिष्णु दुर्यशः
स कौतुकी तत्र ददर्श केतकम् ॥
न्मृगाङ्कचूडामणिवर्जनार्जितम् ।
दधानमाशासु चरिष्णु दुर्यशः
स कौतुकी तत्र ददर्श केतकम् ॥
अन्वयः
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सः कौतुकी तत्र विनिद्र-पत्र-आलि-गत-अलि-कैतवात् मृगाङ्क-चूडामणि-वर्जन-अर्जितम् आशासु चरिष्णु दुर्यशः दधानम् केतकम् ददर्श।
Summary
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There, the curious Nala saw a Ketaki flower. It seemed to be bearing its wandering infamy in all directions, earned from being rejected by Shiva (the moon-crested one). This infamy appeared under the pretext of the black bees settled on its rows of fully bloomed petals.
पदच्छेदः
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| विनिद्रपत्रालिगतालिकैतवात् | विनिद्र–पत्र–आलि–गत–अलि–कैतव (५.१) | under the pretext of the bees on the rows of bloomed petals |
| मृगाङ्कचूडामणिवर्जनार्जितम् | मृगाङ्क–चूडामणि–वर्जन–अर्जित (२.१) | earned from being rejected by Shiva |
| दधानम् | दधान (√धा+शानच्, २.१) | bearing |
| आशासु | आशा (७.३) | in the directions |
| चरिष्णु | चरिष्णु (√चर्+इष्णुच्, २.१) | wandering |
| दुर्यशः | दुर्यशस् (२.१) | infamy |
| सः | तद् (१.१) | he |
| कौतुकी | कौतुकिन् (१.१) | curious |
| तत्र | तत्र | there |
| ददर्श | ददर्श (√दृश् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | saw |
| केतकम् | केतक (२.१) | the Ketaki flower |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वि | नि | द्र | प | त्रा | लि | ग | ता | लि | कै | त | वा |
| न्मृ | गा | ङ्क | चू | डा | म | णि | व | र्ज | ना | र्जि | तम् |
| द | धा | न | मा | शा | सु | च | रि | ष्णु | दु | र्य | शः |
| स | कौ | तु | की | त | त्र | द | द | र्श | के | त | कम् |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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