फलानि पुष्पाणि च पल्लवे करे
वयोतिपातोद्गतवातवेपिते ।
स्थितैः समादाय महर्षिवार्धका-
द्वने तदातिथ्यमशिक्षि शाखिभिः ॥
फलानि पुष्पाणि च पल्लवे करे
वयोतिपातोद्गतवातवेपिते ।
स्थितैः समादाय महर्षिवार्धका-
द्वने तदातिथ्यमशिक्षि शाखिभिः ॥
वयोतिपातोद्गतवातवेपिते ।
स्थितैः समादाय महर्षिवार्धका-
द्वने तदातिथ्यमशिक्षि शाखिभिः ॥
अन्वयः
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तदा वने शाखिभिः वयः-अतिपात-उद्गत-वात-वेपिते पल्लवे करे स्थितैः फलानि पुष्पाणि च समादाय महर्षि-वार्धकात् आतिथ्यम् अशिक्षि।
Summary
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Then, in the forest, it seemed as if hospitality was learned by the trees from the old age of great sages. They offered fruits and flowers situated on their sprout-like branches (hands), which trembled as if from the 'wind' disease that comes with extreme old age.
पदच्छेदः
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| फलानि | फल (२.३) | fruits |
| पुष्पाणि | पुष्प (२.३) | flowers |
| च | च | and |
| पल्लवे | पल्लव (७.१) | sprout-like |
| करे | कर (७.१) | in the hand (branch) |
| वयोतिपातोद्गतवातवेपिते | वयस्–अतिपात–उद्गत–वात–वेपित (७.१) | trembling from the wind (disease) of extreme old age |
| स्थितैः | स्थित (√स्था+क्त, २.३) | situated |
| समादाय | समादाय (सम्+आ√दा+ल्यप्) | having offered |
| महर्षिवार्धकात् | महर्षि–वार्धक (५.१) | from the old age of great sages |
| वने | वन (७.१) | in the forest |
| तदा | तदा | then |
| आतिथ्यम् | आतिथ्य (२.१) | hospitality |
| अशिक्षि | अशिक्षि (√शिक्ष् भावकर्मणोः लुङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | was learned |
| शाखिभिः | शाखिन् (३.३) | by the trees |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| फ | ला | नि | पु | ष्पा | णि | च | प | ल्ल | वे | क | रे |
| व | यो | ति | पा | तो | द्ग | त | वा | त | वे | पि | ते |
| स्थि | तैः | स | मा | दा | य | म | ह | र्षि | वा | र्ध | का |
| द्व | ने | त | दा | ति | थ्य | म | शि | क्षि | शा | खि | भिः |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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