ततः प्रसूने च फले च मञ्जुले
स संमुखस्थाङ्गुलिना जनाधिपः ।
निवेद्यमानं वनपालपाणिना
व्यालोकयत्काननकामनीयकम् ॥
ततः प्रसूने च फले च मञ्जुले
स संमुखस्थाङ्गुलिना जनाधिपः ।
निवेद्यमानं वनपालपाणिना
व्यालोकयत्काननकामनीयकम् ॥
स संमुखस्थाङ्गुलिना जनाधिपः ।
निवेद्यमानं वनपालपाणिना
व्यालोकयत्काननकामनीयकम् ॥
अन्वयः
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ततः सः जनाधिपः संमुख-स्थ-अङ्गुलिना वनपाल-पाणिना मञ्जुले प्रसूने च फले च निवेद्यमानम् कानन-कामनीयकम् व्यालोकयत्।
Summary
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Then, the king observed the loveliness of the forest, which was being pointed out by the hand of the forest-keeper with a forward-pointing finger, indicating the beautiful flowers and fruits.
पदच्छेदः
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| ततः | ततः | Then |
| प्रसूने | प्रसून (७.१) | in the flower |
| च | च | and |
| फले | फल (७.१) | in the fruit |
| च | च | and |
| मञ्जुले | मञ्जुल (७.१) | in the beautiful |
| सः | तद् (१.१) | he |
| संमुखस्थाङ्गुलिना | संमुख–स्थ–अङ्गुलि (३.१) | with a forward-pointing finger |
| जनाधिपः | जन–अधिप (१.१) | the lord of the people (king) |
| निवेद्यमानम् | निवेद्यमान (नि√विद्+णिच्+शानच्, २.१) | being pointed out |
| वनपालपाणिना | वनपाल–पाणि (३.१) | by the hand of the forest-keeper |
| व्यालोकयत् | व्यालोकयत् (वि+आ√लोक् +णिच् कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | observed |
| काननकामनीयकम् | कानन–कामनीयक (२.१) | the loveliness of the forest |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | तः | प्र | सू | ने | च | फ | ले | च | म | ञ्जु | ले |
| स | सं | मु | ख | स्था | ङ्गु | लि | ना | ज | ना | धि | पः |
| नि | वे | द्य | मा | नं | व | न | पा | ल | पा | णि | ना |
| व्या | लो | क | य | त्का | न | न | का | म | नी | य | कम् |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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