वनान्तपर्यन्तमुपेत्य सस्पृहं
क्रमेण तस्मिन्नवतीर्णदृक्पथे ।
न्यवर्ति दृष्टिप्रकरैः पुरौकसा-
मनुव्रजद्बन्धुसमाजबन्धुभिः ॥
वनान्तपर्यन्तमुपेत्य सस्पृहं
क्रमेण तस्मिन्नवतीर्णदृक्पथे ।
न्यवर्ति दृष्टिप्रकरैः पुरौकसा-
मनुव्रजद्बन्धुसमाजबन्धुभिः ॥
क्रमेण तस्मिन्नवतीर्णदृक्पथे ।
न्यवर्ति दृष्टिप्रकरैः पुरौकसा-
मनुव्रजद्बन्धुसमाजबन्धुभिः ॥
अन्वयः
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क्रमेण तस्मिन् वन-अन्त-पर्यन्तम् उपेत्य अवतीर्ण-दृक्-पथे (सति), पुरौकसाम् अनुव्रजत्-बन्धु-समाज-बन्धुभिः दृष्टि-प्रकरैः सस्पृहम् न्यवर्ति।
Summary
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When Nala, having gradually reached the edge of the forest, passed beyond the range of sight, the multitudes of gazes from the city-dwellers, which were like friends to the group of relatives following him, longingly turned back.
पदच्छेदः
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| वनान्तपर्यन्तम् | वन–अन्त–पर्यन्त (२.१) | up to the edge of the forest |
| उपेत्य | उपेत्य (उप√इ+ल्यप्) | having approached |
| सस्पृहम् | सस्पृहम् | longingly |
| क्रमेण | क्रम (३.१) | gradually |
| तस्मिन् | तद् (७.१) | when he |
| अवतीर्णदृक्पथे | अवतीर्ण–दृक्–पथ (७.१) | had passed beyond the range of sight |
| न्यवर्ति | न्यवर्ति (नि√वृत् +णिच् भावकर्मणोः लुङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | were turned back |
| दृष्टिप्रकरैः | दृष्टि–प्रकर (३.३) | by the multitudes of gazes |
| पुरौकसाम् | पुरौकस् (६.३) | of the city-dwellers |
| अनुव्रजद्बन्धुसमाजबन्धुभिः | अनुव्रजत्–बन्धु–समाज–बन्धु (३.३) | which were friends to the group of relatives following him |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| व | ना | न्त | प | र्य | न्त | मु | पे | त्य | स | स्पृ | हं |
| क्र | मे | ण | त | स्मि | न्न | व | ती | र्ण | दृ | क्प | थे |
| न्य | व | र्ति | दृ | ष्टि | प्र | क | रैः | पु | रौ | क | सा |
| म | नु | व्र | ज | द्ब | न्धु | स | मा | ज | ब | न्धु | भिः |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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