चलन्नलंकृत्य महारयं हयं
स्ववाहवाहोचितवेषपेशलः ।
प्रमोदनिःस्पन्दतराक्षिपक्ष्मभि-
र्व्यलोकि लोकैर्नगरालयैर्नलः ॥
चलन्नलंकृत्य महारयं हयं
स्ववाहवाहोचितवेषपेशलः ।
प्रमोदनिःस्पन्दतराक्षिपक्ष्मभि-
र्व्यलोकि लोकैर्नगरालयैर्नलः ॥
स्ववाहवाहोचितवेषपेशलः ।
प्रमोदनिःस्पन्दतराक्षिपक्ष्मभि-
र्व्यलोकि लोकैर्नगरालयैर्नलः ॥
अन्वयः
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स्व-वाह-वाह-उचित-वेष-पेशलः नलः महा-रयम् हयम् अलंकृत्य चलन् (सन्), नगर-आलयैः लोकैः प्रमोद-निःस्पन्दतर-अक्षि-पक्ष्मभिः व्यलोकि ।
Summary
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As Nala, handsomely attired for riding, set out after adorning his swift horse, he was watched by the city-dwellers. Their eyelashes were rendered even more still than usual by the sheer joy of the sight.
पदच्छेदः
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| चलन् | चलत् (√चल्+शतृ, १.१) | moving |
| अलंकृत्य | अलंकृत्य (अलम्√कृ+ल्यप्) | having adorned |
| महारयम् | महा–रय (२.१) | very swift |
| हयम् | हय (२.१) | horse |
| स्ववाहवाहोचितवेषपेशलः | स्व–वाह–वाह–उचित–वेष–पेशल (१.१) | handsome in attire suitable for a rider of his own mount |
| प्रमोदनिःस्पन्दतराक्षिपक्ष्मभिः | प्रमोद–निःस्पन्दतर–अक्षि–पक्ष्मन् (३.३) | with eyelashes more motionless due to joy |
| व्यलोकि | व्यलोकि (वि√लोक् भावकर्मणोः लुङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | was seen |
| लोकैः | लोक (३.३) | by the people |
| नगरालयैः | नगर–आलय (३.३) | dwelling in the city |
| नलः | नल (१.१) | Nala |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| च | ल | न्न | लं | कृ | त्य | म | हा | र | यं | ह | यं |
| स्व | वा | ह | वा | हो | चि | त | वे | ष | पे | श | लः |
| प्र | मो | द | निः | स्प | न्द | त | रा | क्षि | प | क्ष्म | भि |
| र्व्य | लो | कि | लो | कै | र्न | ग | रा | ल | यै | र्न | लः |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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