अपि द्विजिह्वाभ्यवहारपौरुषे
मुखानुषक्तायतवल्गुवल्गया ।
उपेयिवांसं प्रतिमल्लतां रय-
स्मये जितस्य प्रसभं गरुत्मतः ॥
अपि द्विजिह्वाभ्यवहारपौरुषे
मुखानुषक्तायतवल्गुवल्गया ।
उपेयिवांसं प्रतिमल्लतां रय-
स्मये जितस्य प्रसभं गरुत्मतः ॥
मुखानुषक्तायतवल्गुवल्गया ।
उपेयिवांसं प्रतिमल्लतां रय-
स्मये जितस्य प्रसभं गरुत्मतः ॥
अन्वयः
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अपि द्विजिह्व-अभ्यवहार-पौरुषे (सति), मुख-अनुषक्त-आयत-वल्गु-वल्गया, रय-स्मये प्रसभम् जितस्य गरुत्मतः प्रतिमल्लताम् उपेयिवांसम् (तम् हयम्) ।
Summary
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With a beautiful, long bridle at its mouth, the horse had become a rival to Garuda, who was forcefully defeated in a contest of speed. The horse even matched Garuda's famed prowess in 'devouring snakes' by metaphorically consuming the wind with its velocity.
पदच्छेदः
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| अपि | अपि | even |
| द्विजिह्वाभ्यवहारपौरुषे | द्विजिह्व–अभ्यवहार–पौरुष (७.१) | in the prowess of devouring snakes (wind) |
| मुखानुषक्तायतवल्गुवल्गया | मुख–अनुषक्त–आयत–वल्गु–वल्गा (३.१) | with the long and beautiful bridle attached to its mouth |
| उपेयिवांसम् | उपेयिवस् (उप√इ+क्वसु, २.१) | having attained |
| प्रतिमल्लताम् | प्रतिमल्ल (२.१) | the state of being a rival |
| रयस्मये | रय–स्मय (७.१) | in the pride of speed |
| जितस्य | जित (√जि+क्त, ६.१) | of the conquered |
| प्रसभम् | प्रसभम् | forcefully |
| गरुत्मतः | गरुत्मत् (६.१) | of Garuda |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | पि | द्वि | जि | ह्वा | भ्य | व | हा | र | पौ | रु | षे |
| मु | खा | नु | ष | क्ता | य | त | व | ल्गु | व | ल्ग | या |
| उ | पे | यि | वां | सं | प्र | ति | म | ल्ल | तां | र | य |
| स्म | ये | जि | त | स्य | प्र | स | भं | ग | रु | त्म | तः |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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