अथान्तरेणावटुगामिनाध्वना
निशीथिनीनाथमहः सहोदरैः ।
निगालगाद्देवमणेरिवोत्थितै-
र्विराजितं केसरकेशरश्मिभिः ॥
अथान्तरेणावटुगामिनाध्वना
निशीथिनीनाथमहः सहोदरैः ।
निगालगाद्देवमणेरिवोत्थितै-
र्विराजितं केसरकेशरश्मिभिः ॥
निशीथिनीनाथमहः सहोदरैः ।
निगालगाद्देवमणेरिवोत्थितै-
र्विराजितं केसरकेशरश्मिभिः ॥
अन्वयः
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अथ सः अश्वः निगालगात् देवमणेः इव उत्थितैः, निशीथिनीनाथमहःसहोदरैः केसरकेशरश्मिभिः विराजितम्, तथा अन्तरेण अवटुगामिना अध्वना विराजितम् आसीत्।
Summary
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The horse was adorned with rays of mane-hair that were like brothers to the moonlight, seeming to rise from a divine gem placed on its neck. It was also distinguished by a parting in its mane that ran down to the nape of its neck.
पदच्छेदः
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| अथ | अथ | And |
| अन्तरेण | अन्तरेण | in the middle |
| अवटुगामिना | अवटु–गामिन् (३.१) | going to the nape of the neck |
| अध्वना | अध्वन् (३.१) | by the parting |
| निशीथिनीनाथमहःसहोदरैः | निशीथिनी–नाथ–महस्–सहोदर (३.३) | which were brothers to the light of the moon |
| निगालगात् | निगाल–ग (५.१) | from the neck |
| देवमणेः | देव–मणि (५.१) | than a divine gem |
| इव | इव | like |
| उत्थितैः | उत्थित (उद्√स्था+क्त, ३.३) | risen |
| विराजितं | विराजित (वि√राज्+क्त, २.१) | adorned |
| केसरकेशरश्मिभिः | केसर–केश–रश्मि (३.३) | by the rays of mane-hair |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | था | न्त | रे | णा | व | टु | गा | मि | ना | ध्व | ना |
| नि | शी | थि | नी | ना | थ | म | हः | स | हो | द | रैः |
| नि | गा | ल | गा | द्दे | व | म | णे | रि | वो | त्थि | तै |
| र्वि | रा | जि | तं | के | स | र | के | श | र | श्मि | भिः |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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