अमी ततस्तस्य विभूषितं सितं
जवेऽपि मानेऽपि च पौरुषाधिकम् ।
उपाहरन्नश्वमजस्रचञ्चलैः
खुराञ्चलैः क्षोदितमन्दुरोदरम् ॥
अमी ततस्तस्य विभूषितं सितं
जवेऽपि मानेऽपि च पौरुषाधिकम् ।
उपाहरन्नश्वमजस्रचञ्चलैः
खुराञ्चलैः क्षोदितमन्दुरोदरम् ॥
जवेऽपि मानेऽपि च पौरुषाधिकम् ।
उपाहरन्नश्वमजस्रचञ्चलैः
खुराञ्चलैः क्षोदितमन्दुरोदरम् ॥
अन्वयः
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ततः अमी तस्य कृते विभूषितं, सितं, जवे अपि माने अपि च पौरुषाधिकम्, अजस्रचञ्चलैः खुराञ्चलैः क्षोदितमन्दुरोदरम् अश्वम् उपाहरन्।
Summary
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Then, they (the servants) brought for him a decorated white horse, which was superior in spirit, both in speed and in size, and which had pounded the floor of its stable with the constantly moving tips of its hooves.
पदच्छेदः
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| अमी | अदस् (१.३) | they |
| ततः | ततः | then |
| तस्य | तद् (६.१) | for him |
| विभूषितं | विभूषित (वि√भूष्+क्त, २.१) | decorated |
| सितं | सित (२.१) | white |
| जवे | जव (७.१) | in speed |
| अपि | अपि | also |
| माने | मान (७.१) | in size |
| अपि | अपि | also |
| च | च | and |
| पौरुषाधिकम् | पौरुष–अधिक (२.१) | superior in spirit |
| उपाहरन् | उपाहरन् (उप+आ√हृ कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | brought |
| अश्वम् | अश्व (२.१) | a horse |
| अजस्रचञ्चलैः | अजस्र–चञ्चल (३.३) | by constantly moving |
| खुराञ्चलैः | खुर–अञ्चल (३.३) | tips of hooves |
| क्षोदितमन्दुरोदरम् | क्षोदित (√क्षुद्+क्त)–मन्दुर–उदर (२.१) | which had pounded the interior of its stable |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | मी | त | त | स्त | स्य | वि | भू | षि | तं | सि | तं |
| ज | वे | ऽपि | मा | ने | ऽपि | च | पौ | रु | षा | धि | कम् |
| उ | पा | ह | र | न्न | श्व | म | ज | स्र | च | ञ्च | लैः |
| खु | रा | ञ्च | लैः | क्षो | दि | त | म | न्दु | रो | द | रम् |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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