अनङ्गचिह्नं स विना शशाक नो
यदासितुं संसदि यत्नवानपि ।
क्षणं तदारामविहारकैतवा-
न्निषेवितुं देशमियेष निर्जनम् ॥
अनङ्गचिह्नं स विना शशाक नो
यदासितुं संसदि यत्नवानपि ।
क्षणं तदारामविहारकैतवा-
न्निषेवितुं देशमियेष निर्जनम् ॥
यदासितुं संसदि यत्नवानपि ।
क्षणं तदारामविहारकैतवा-
न्निषेवितुं देशमियेष निर्जनम् ॥
अन्वयः
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यदा यत्नवान् अपि सः संसदि अनङ्गचिह्नं विना आसितुं नो शशाक, तदा आरामविहारकैतवात् क्षणं निर्जनं देशं निषेवितुम् इयेष।
Summary
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When, despite his efforts, he was unable to remain in the assembly without showing signs of love-sickness, he then desired to resort to a solitary place for a moment under the pretext of strolling in the garden.
पदच्छेदः
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| अनङ्गचिह्नं | अनङ्ग–चिह्न (२.१) | signs of love-sickness |
| सः | तद् (१.१) | he |
| विना | विना | without |
| शशाक | शशाक (√शक् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | was able |
| नो | न | not |
| यदा | यदा | when |
| आसितुं | आसितुम् (√आस्+तुमुन्) | to stay |
| संसदि | संसद् (७.१) | in the assembly |
| यत्नवान् | यत्नवत् (१.१) | making an effort |
| अपि | अपि | even |
| क्षणं | क्षण (२.१) | for a moment |
| तदा | तदा | then |
| आरामविहारकैतवात् | आराम–विहार–कैतव (५.१) | under the pretext of strolling in the garden |
| निषेवितुं | निषेवितुम् (नि√सेव्+तुमुन्) | to resort to |
| देशम् | देश (२.१) | a place |
| इयेष | इयेष (√इष् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | wished |
| निर्जनम् | निर्जन (२.१) | solitary |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | न | ङ्ग | चि | ह्नं | स | वि | ना | श | शा | क | नो |
| य | दा | सि | तुं | सं | स | दि | य | त्न | वा | न | पि |
| क्ष | णं | त | दा | रा | म | वि | हा | र | कै | त | वा |
| न्नि | षे | वि | तुं | दे | श | मि | ये | ष | नि | र्ज | नम् |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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