अवाप सापत्रपतां स भूपति-
र्जितेन्द्रियाणां धुरि कीर्तितस्थितिः ।
असंवरे शंबरवैरिविक्रमे
क्रमेण तत्र स्फुटतामुपेयुषि ॥
अवाप सापत्रपतां स भूपति-
र्जितेन्द्रियाणां धुरि कीर्तितस्थितिः ।
असंवरे शंबरवैरिविक्रमे
क्रमेण तत्र स्फुटतामुपेयुषि ॥
र्जितेन्द्रियाणां धुरि कीर्तितस्थितिः ।
असंवरे शंबरवैरिविक्रमे
क्रमेण तत्र स्फुटतामुपेयुषि ॥
अन्वयः
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जितेन्द्रियाणां धुरि कीर्तितस्थितिः सः भूपतिः, तत्र असंवर-शंबरवैरि-विक्रमे क्रमेण स्फुटताम् उपेयुषि सति, स-अपत्रपताम् अवाप।
Summary
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That king, whose position was celebrated at the forefront of those who have conquered their senses, felt ashamed when the uncontrollable prowess of Kāma (the enemy of Śambara) gradually became manifest in him.
पदच्छेदः
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| अवाप | अवाप (अव√आप् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | obtained |
| सापत्रपताम् | स-अपत्रपता (२.१) | shame |
| सः | तद् (१.१) | he |
| भूपतिः | भूपति (१.१) | the king |
| जितेन्द्रियाणां | जित (√जि+क्त)–इन्द्रिय (६.३) | of those who have conquered their senses |
| धुरि | धुर् (७.१) | at the forefront |
| कीर्तितस्थितिः | कीर्तित (√कीर्त्+क्त)–स्थिति (१.१) | whose position is celebrated |
| असंवरेशंबरवैरिविक्रमे | असंवर–शंबरवैरिन्–विक्रम (७.१) | in the uncontrollable prowess of the enemy of Śambara (Kāma) |
| क्रमेण | क्रम (३.१) | gradually |
| तत्र | तत्र | in that matter |
| स्फुटताम् | स्फुटता (२.१) | manifestation |
| उपेयुषि | उपेयिवस् (उप√इ+क्वसु, ७.१) | having attained |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | वा | प | सा | प | त्र | प | तां | स | भू | प | ति |
| र्जि | ते | न्द्रि | या | णां | धु | रि | की | र्ति | त | स्थि | तिः |
| अ | सं | व | रे | शं | ब | र | वै | रि | वि | क्र | मे |
| क्र | मे | ण | त | त्र | स्फु | ट | ता | मु | पे | यु | षि |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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