मृषाविषादाभिनयादयं क्वचि-
ज्जुगोप निःश्वासततिं वियोगजाम् ।
विलेपनस्याधिकचन्द्रभागता-
विभावनाच्चापललाप पाण्डुताम् ॥
मृषाविषादाभिनयादयं क्वचि-
ज्जुगोप निःश्वासततिं वियोगजाम् ।
विलेपनस्याधिकचन्द्रभागता-
विभावनाच्चापललाप पाण्डुताम् ॥
ज्जुगोप निःश्वासततिं वियोगजाम् ।
विलेपनस्याधिकचन्द्रभागता-
विभावनाच्चापललाप पाण्डुताम् ॥
अन्वयः
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अयं क्वचित् मृषाविषादाभिनयात् वियोगजां निःश्वासततिं जुगोप, च विलेपनस्य अधिकचन्द्रभागताविभावनात् पाण्डुताम् अपललाप।
Summary
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This king (Nala) sometimes concealed the series of sighs born from separation by feigning false sorrow. And he concealed his paleness by attributing it to the excessive camphor-like quality (coolness and whiteness) of his ointment.
पदच्छेदः
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| मृषाविषादाभिनयात् | मृषा–विषाद–अभिनय (५.१) | by feigning false sorrow |
| अयं | इदम् (१.१) | this (king) |
| क्वचित् | क्वचित् | sometimes |
| जुगोप | जुगोप (√गुप् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | concealed |
| निःश्वासततिं | निःश्वास–तति (२.१) | the series of sighs |
| वियोगजाम् | वियोग–जा (√जन्, २.१) | born of separation |
| विलेपनस्य | विलेपन (६.१) | of the ointment |
| अधिकचन्द्रभागताविभावनात् | अधिक–चन्द्रभागता–विभावना (५.१) | from attributing the quality of being excessively like camphor |
| च | च | and |
| अपललाप | अपललाप (अप√लप् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | concealed |
| पाण्डुताम् | पाण्डुता (२.१) | paleness |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| मृ | षा | वि | षा | दा | भि | न | या | द | यं | क्व | चि |
| ज्जु | गो | प | निः | श्वा | स | त | तिं | वि | यो | ग | जाम् |
| वि | ले | प | न | स्या | धि | क | च | न्द्र | भा | ग | ता |
| वि | भा | व | ना | च्चा | प | ल | ला | प | पा | ण्डु | ताम् |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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