स्मरोपतप्तोऽपि भृशं न स प्रभु-
र्विदर्भराजं तनयामयाचत ।
त्यजन्त्यसूञ्शर्म च मानिनो वरं
त्यजन्ति न त्वेकमयाचितव्रतम् ॥
स्मरोपतप्तोऽपि भृशं न स प्रभु-
र्विदर्भराजं तनयामयाचत ।
त्यजन्त्यसूञ्शर्म च मानिनो वरं
त्यजन्ति न त्वेकमयाचितव्रतम् ॥
र्विदर्भराजं तनयामयाचत ।
त्यजन्त्यसूञ्शर्म च मानिनो वरं
त्यजन्ति न त्वेकमयाचितव्रतम् ॥
अन्वयः
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स्मर-उपतप्तः अपि सः प्रभुः भृशम् विदर्भ-राजम् तनयाम् न अयाचत । मानिनः वरम् असून् शर्म च त्यजन्ति, तु एकम् अयाचित-व्रतम् न त्यजन्ति ।
Summary
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Even though that lord (Nala) was greatly tormented by love, he did not ask the king of Vidarbha for his daughter. For, the self-respecting would rather give up their lives and happiness, but they will not abandon their one vow of never asking for anything.
पदच्छेदः
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| स्मर-उपतप्तः | स्मर–उपतप्त (उप√तप्+क्त, १.१) | tormented by love |
| अपि | अपि | even though |
| भृशम् | भृशम् | greatly |
| न | न | not |
| सः | तद् (१.१) | that |
| प्रभुः | प्रभु (१.१) | lord |
| विदर्भ-राजम् | विदर्भ–राजन् (२.१) | the king of Vidarbha |
| तनयाम् | तनया (२.१) | the daughter |
| अयाचत | अयाचत (√याच् कर्तरि लङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | did ask for |
| त्यजन्ति | त्यजन्ति (√त्यज् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | they give up |
| असून् | असु (२.३) | life-breaths |
| शर्म | शर्मन् (२.१) | happiness |
| च | च | and |
| मानिनः | मानिन् (१.३) | the self-respecting |
| वरम् | वरम् | rather |
| त्यजन्ति | त्यजन्ति (√त्यज् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | they give up |
| न | न | not |
| तु | तु | but |
| एकम् | एक (२.१) | one |
| अयाचित-व्रतम् | अयाचित–व्रत (२.१) | the vow of not asking |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स्म | रो | प | त | प्तो | ऽपि | भृ | शं | न | स | प्र | भु |
| र्वि | द | र्भ | रा | जं | त | न | या | म | या | च | त |
| त्य | ज | न्त्य | सू | ञ्श | र्म | च | मा | नि | नो | व | रं |
| त्य | ज | न्ति | न | त्वे | क | म | या | चि | त | व्र | तम् |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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