अहो अहोभिर्महिमा हिमागमेऽ
प्यभिप्रपेदे प्रति तां स्मरार्दिताम् ।
तपर्तुपूर्तावपि मेदसां भरा
विभावरीभिर्बिभरांबभूविरे ॥
अहो अहोभिर्महिमा हिमागमेऽ
प्यभिप्रपेदे प्रति तां स्मरार्दिताम् ।
तपर्तुपूर्तावपि मेदसां भरा
विभावरीभिर्बिभरांबभूविरे ॥
प्यभिप्रपेदे प्रति तां स्मरार्दिताम् ।
तपर्तुपूर्तावपि मेदसां भरा
विभावरीभिर्बिभरांबभूविरे ॥
अन्वयः
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स्मर-आर्दिताम् ताम् प्रति हिमागमे अपि अहोभिः महिमा अभिप्रपेदे अहो । तप-ऋतु-पूर्तौ अपि मेदसाम् भराः विभावरीभिः बिभराम्बभूविरे अहो ।
Summary
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Oh! Towards her, who was afflicted by love, the days seemed to gain greatness (i.e., length) even in winter. And oh! Even at the end of summer, the nights seemed to bear the burden of excess fat (i.e., felt heavy and long).
पदच्छेदः
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| अहो | अहो | Oh! |
| अहोभिः | अहन् (३.३) | by the days |
| महिमा | महिमन् (१.१) | greatness |
| हिम-आगमे | हिम–आगम (७.१) | in the arrival of winter |
| अपि | अपि | even |
| अभिप्रपेदे | अभिप्रपेदे (अभि+प्र√पद् कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | attained |
| प्रति | प्रति | towards |
| ताम् | तद् (२.१) | her |
| स्मर-आर्दिताम् | स्मर–आर्दित (√अर्द्+क्त, २.१) | who was afflicted by love |
| तप-ऋतु-पूर्तौ | तप–ऋतु–पूर्ति (७.१) | at the end of the summer season |
| अपि | अपि | even |
| मेदसाम् | मेदस् (६.३) | of fats |
| भराः | भर (१.३) | fullness/excesses |
| विभावरीभिः | विभावरी (३.३) | by the nights |
| बिभराम्बभूविरे | बिभराम्बभूविरे (√भृ +णिच्+आम् कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. बहु.) | were borne |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | हो | अ | हो | भि | र्म | हि | मा | हि | मा | ग | मे |
| ऽप्य | भि | प्र | पे | दे | प्र | ति | तां | स्म | रा | र्दि | ताम् |
| त | प | र्तु | पू | र्ता | व | पि | मे | द | सां | भ | रा |
| वि | भा | व | री | भि | र्बि | भ | रां | ब | भू | वि | रे |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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