श्रियास्य योग्याहमिति स्वमीक्षितुं
करे तमालोक्य सुरूपया धृतः ।
विहाय भैमीमपदर्पया कया
न दर्पणः श्वासमलीमसः कृतः ॥
श्रियास्य योग्याहमिति स्वमीक्षितुं
करे तमालोक्य सुरूपया धृतः ।
विहाय भैमीमपदर्पया कया
न दर्पणः श्वासमलीमसः कृतः ॥
करे तमालोक्य सुरूपया धृतः ।
विहाय भैमीमपदर्पया कया
न दर्पणः श्वासमलीमसः कृतः ॥
अन्वयः
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सुरूपया अपदर्पया कया श्रिया अस्य योग्या अहम् इति स्वम् ईक्षितुम् करे तम् (दर्पणम्) आलोक्य, भैमीम् विहाय, धृतः दर्पणः श्वासमलीमसः न कृतः?
Summary
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Which beautiful woman, seeking to see in a mirror held in her hand if she was worthy of Nala's beauty, did not, upon realizing only Damayanti was a match, soil that mirror with her sighs of despair, her pride thus vanquished?
पदच्छेदः
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| श्रिया | श्री (३.१) | by beauty |
| अस्य | इदम् (६.१) | of this one (Nala) |
| योग्या | योग्य (१.१) | worthy |
| अहम् | अस्मद् (१.१) | I |
| इति | इति | thus |
| स्वम् | स्व (२.१) | oneself |
| ईक्षितुम् | ईक्षितुम् (√ईक्ष्+तुमुन्) | to see |
| करे | कर (७.१) | in the hand |
| तम् | तद् (२.१) | that |
| आलोक्य | आलोक्य (आ√लोक्+ल्यप्) | having seen |
| सुरूपया | सुरूप (३.१) | by a beautiful woman |
| धृतः | धृत (√धृ+क्त, १.१) | held |
| विहाय | विहाय (वि√हा+ल्यप्) | leaving aside |
| भैमीम् | भैमी (२.१) | Damayanti |
| अपदर्पया | अपदर्प (३.१) | by one whose pride is gone |
| कया | किम् (३.१) | by which woman |
| न | न | not |
| दर्पणः | दर्पण (१.१) | the mirror |
| श्वासमलीमसः | श्वास–मलीमस (१.१) | soiled by breath |
| कृतः | कृत (√कृ+क्त, १.१) | was made |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| श्रि | या | स्य | यो | ग्या | ह | मि | ति | स्व | मी | क्षि | तुं |
| क | रे | त | मा | लो | क्य | सु | रू | प | या | धृ | तः |
| वि | हा | य | भै | मी | म | प | द | र्प | या | क | या |
| न | द | र्प | णः | श्वा | स | म | ली | म | सः | कृ | तः |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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