पवित्रमत्रातनुते जगद्युगे
स्मृता रसक्षालनयेव यत्कथा ।
कथं न सा मद्गिरमाविलामपि
स्वसेविनीमेव पवित्रयिष्यति ॥
पवित्रमत्रातनुते जगद्युगे
स्मृता रसक्षालनयेव यत्कथा ।
कथं न सा मद्गिरमाविलामपि
स्वसेविनीमेव पवित्रयिष्यति ॥
स्मृता रसक्षालनयेव यत्कथा ।
कथं न सा मद्गिरमाविलामपि
स्वसेविनीमेव पवित्रयिष्यति ॥
अन्वयः
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अत्र जगत्-युगे स्मृता यत्-कथा रस-क्षालनया इव पवित्रम् अतनुते, सा स्व-सेविनीम् आविलाम् अपि मत्-गिरम् कथम् न पवित्रयिष्यति एव?
Summary
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In this world, the story of Nala, when remembered, spreads purity as if by a cleansing of the tongue. How, then, will it not indeed purify my speech, which serves it, even though it is sullied?
पदच्छेदः
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| पवित्रम् | पवित्र (२.१) | purity |
| अत्र | अत्र | here |
| अतनुते | अतनुते (√तन् कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | spreads |
| जगद्युगे | जगत्–युग (७.१) | in the age of the world |
| स्मृता | स्मृत (√स्मृ+क्त, १.१) | being remembered |
| रसक्षालनया | रसना–क्षालना (३.१) | by the cleansing of the tongue |
| इव | इव | as if |
| यत्कथा | यद्–कथा (१.१) | whose story |
| कथम् | कथम् | how |
| न | न | not |
| सा | तद् (१.१) | she (that story) |
| मद्गिरम् | मद्–गिर् (२.१) | my speech |
| आविलाम् | आविल (२.१) | which is sullied |
| अपि | अपि | even |
| स्वसेविनीम् | स्व–सेविनी (२.१) | which serves it |
| एव | एव | indeed |
| पवित्रयिष्यति | पवित्रयिष्यति (√पवित्रि कर्तरि लृट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | will purify |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प | वि | त्र | म | त्रा | त | नु | ते | ज | ग | द्यु | गे |
| स्मृ | ता | र | स | क्षा | ल | न | ये | व | य | त्क | था |
| क | थं | न | सा | म | द्गि | र | मा | वि | ला | म | पि |
| स्व | से | वि | नी | मे | व | प | वि | त्र | यि | ष्य | ति |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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