अदस्तदाकर्णि फलाढ्यजीवितं
दृशोर्द्वयं नस्तदवीक्षि चाफलम् ।
इति स्म चक्षुःश्रवसां प्रिया नले
स्तुवन्ति निन्दन्ति हृदा तदात्मनः ॥
अदस्तदाकर्णि फलाढ्यजीवितं
दृशोर्द्वयं नस्तदवीक्षि चाफलम् ।
इति स्म चक्षुःश्रवसां प्रिया नले
स्तुवन्ति निन्दन्ति हृदा तदात्मनः ॥
दृशोर्द्वयं नस्तदवीक्षि चाफलम् ।
इति स्म चक्षुःश्रवसां प्रिया नले
स्तुवन्ति निन्दन्ति हृदा तदात्मनः ॥
अन्वयः
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चक्षुःश्रवसाम् प्रियाः नले इति स्म (चिन्तयन्ति) - अदः तत् आकर्णि फलाढ्यजीवितम्, नः दृशोः द्वयम् तत् अवीक्षि च अफलम् । इति हृदा तदा आत्मनः (अङ्गानि) स्तुवन्ति निन्दन्ति च ।
Summary
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The Naga maidens, hearing of Nala, thought thus in their hearts: 'Our ears, which have heard of him, have a fruitful existence, but our pair of eyes, not having seen him, are fruitless.' Thus they praised their ears and blamed their eyes.
पदच्छेदः
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| अदः | अदस् (१.१) | That |
| तदाकर्णि | तद्–आकर्णिन् (१.१) | ear of ours |
| फलाढ्यजीवितं | फल–आढ्य–जीवित (१.१) | has a fruitful existence |
| दृशोः | दृश् (६.२) | of the two eyes |
| द्वयं | द्वय (१.१) | the pair |
| नः | अस्मद् (६.३) | our |
| तदवीक्षि | तद्–अवीक्षिन् (१.१) | not seeing him |
| च | च | and |
| अफलम् | अफल (१.१) | is fruitless |
| इति | इति | Thus |
| स्म | स्म | indeed |
| चक्षुःश्रवसां | चक्षुःश्रवस् (६.३) | of the serpents |
| प्रियाः | प्रिया (१.३) | the beloveds (Naga maidens) |
| नले | नल (७.१) | regarding Nala |
| स्तुवन्ति | स्तुवन्ति (√स्तु कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | praise |
| निन्दन्ति | निन्दन्ति (√निन्द् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | blame |
| हृदा | हृद् (३.१) | in their hearts |
| तदा | तदा | then |
| आत्मनः | आत्मन् (२.३) | their own (organs) |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | द | स्त | दा | क | र्णि | फ | ला | ढ्य | जी | वि | तं |
| दृ | शो | र्द्व | यं | न | स्त | द | वी | क्षि | चा | फ | लम् |
| इ | ति | स्म | च | क्षुः | श्र | व | सां | प्रि | या | न | ले |
| स्तु | व | न्ति | नि | न्द | न्ति | हृ | दा | त | दा | त्म | नः |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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