महीभृतस्तस्य च मन्मथश्रिया
निजस्य चित्तस्य च तं प्रतीच्छया ।
द्विधा नृपे तत्र जगत्त्रयीभुवां
नतभ्रुवां मन्मथविभ्रमोऽभवत् ॥
महीभृतस्तस्य च मन्मथश्रिया
निजस्य चित्तस्य च तं प्रतीच्छया ।
द्विधा नृपे तत्र जगत्त्रयीभुवां
नतभ्रुवां मन्मथविभ्रमोऽभवत् ॥
निजस्य चित्तस्य च तं प्रतीच्छया ।
द्विधा नृपे तत्र जगत्त्रयीभुवां
नतभ्रुवां मन्मथविभ्रमोऽभवत् ॥
अन्वयः
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तत्र नृपे, जगत्-त्रयी-भुवाम् नत-भ्रुवाम् मन्मथ-विभ्रमः तस्य महीभृतः मन्मथ-श्रिया च, तम् प्रति निजस्य चित्तस्य इच्छया च, द्विधा अभवत् ।
Summary
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The amorous agitation of the beautiful women of the three worlds towards that king arose in two ways: firstly, from his own Cupid-like splendor, and secondly, from their own minds' desire for him.
पदच्छेदः
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| महीभृतः | महीभृत् (६.१) | of the king |
| तस्य | तद् (६.१) | his |
| च | च | and |
| मन्मथश्रिया | मन्मथ–श्री (३.१) | by the Cupid-like splendor |
| निजस्य | निज (६.१) | of their own |
| चित्तस्य | चित्त (६.१) | of the mind |
| च | च | and |
| तं | तद् (२.१) | him |
| प्रतीच्छया | प्रति–इच्छा (३.१) | by the desire towards |
| द्विधा | द्विधा | in two ways |
| नृपे | नृप (७.१) | in that king |
| तत्र | तत्र | in that matter |
| जगत्त्रयीभुवां | जगत्–त्रयी–भू (६.३) | of the women of the three worlds |
| नतभ्रुवां | नत–भ्रू (६.३) | of those with curved eyebrows |
| मन्मथविभ्रमः | मन्मथ–विभ्रम (१.१) | the amorous agitation |
| अभवत् | अभवत् (अ√भू कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | arose |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| म | ही | भृ | त | स्त | स्य | च | म | न्म | थ | श्रि | या |
| नि | ज | स्य | चि | त्त | स्य | च | तं | प्र | ती | च्छ | या |
| द्वि | धा | नृ | पे | त | त्र | ज | ग | त्त्र | यी | भु | वां |
| न | त | भ्रु | वां | म | न्म | थ | वि | भ्र | मो | ऽभ | वत् |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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