अमुष्य दोर्भ्यामरिदुर्गलुण्ठने
ध्रुवं गृहीतार्गलदीर्घपीनता ।
उरः श्रिया तत्र च गोपुरस्फुर-
त्कपाटदुर्धर्षतिरःप्रसारिता ॥
अमुष्य दोर्भ्यामरिदुर्गलुण्ठने
ध्रुवं गृहीतार्गलदीर्घपीनता ।
उरः श्रिया तत्र च गोपुरस्फुर-
त्कपाटदुर्धर्षतिरःप्रसारिता ॥
ध्रुवं गृहीतार्गलदीर्घपीनता ।
उरः श्रिया तत्र च गोपुरस्फुर-
त्कपाटदुर्धर्षतिरःप्रसारिता ॥
अन्वयः
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अमुष्य दोर्भ्याम् अरि-दुर्ग-लुण्ठने ध्रुवम् अर्गल-दीर्घ-पीनता गृहीता । तत्र च उरः श्रिया गोपुर-स्फुरत्-कपाट-दुर्धर्ष-तिरः-प्रसारिता (गुणः) गृहीता ।
Summary
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In plundering enemy forts, Nala's two arms certainly acquired the length and stoutness of gate-bolts. And his chest's splendor possessed the invincible, broad expanse of the shining door panels of a great city gate.
पदच्छेदः
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| अमुष्य | अदस् (६.१) | Of him |
| दोर्भ्याम् | दोस् (३.२) | by his two arms |
| अरिदुर्गलुण्ठने | अरि–दुर्ग–लुण्ठन (७.१) | in plundering enemy forts |
| ध्रुवम् | ध्रुवम् | certainly |
| गृहीतार्गलदीर्घपीनता | गृहीत (√गृहीत+क्त)–अर्गल–दीर्घ–पीनता (१.१) | the length and stoutness of a gate-bolt was assumed |
| उरः | उरस् (१.१) | the chest |
| श्रिया | श्री (३.१) | by the splendor |
| तत्र | तत्र | there |
| च | च | and |
| गोपुरस्फुरत्कपाटदुर्धर्षतिरःप्रसारिता | गोपुर–स्फुरत् (√स्फुरत्+शतृ)–कपाट–दुर्धर्ष–तिरस्–प्रसारिता (प्र√सृ+णिच्+क्त+टाप्, १.१) | the quality of being spread out invincibly like the shining panels of a city-gate |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | मु | ष्य | दो | र्भ्या | म | रि | दु | र्ग | लु | ण्ठ | ने |
| ध्रु | वं | गृ | ही | ता | र्ग | ल | दी | र्घ | पी | न | ता |
| उ | रः | श्रि | या | त | त्र | च | गो | पु | र | स्फु | र |
| त्क | पा | ट | दु | र्ध | र्ष | ति | रः | प्र | सा | रि | ता |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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