अयं दरिद्रो भवितेति वैधसीं
विपिं ललाटेऽर्थिजनस्य जाग्रतीम् ।
मृषा न चक्रेऽल्पितकल्पपादपः
प्रणीय दारिद्रदरिद्रतां नलः ॥
अयं दरिद्रो भवितेति वैधसीं
विपिं ललाटेऽर्थिजनस्य जाग्रतीम् ।
मृषा न चक्रेऽल्पितकल्पपादपः
प्रणीय दारिद्रदरिद्रतां नलः ॥
विपिं ललाटेऽर्थिजनस्य जाग्रतीम् ।
मृषा न चक्रेऽल्पितकल्पपादपः
प्रणीय दारिद्रदरिद्रतां नलः ॥
अन्वयः
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अल्पितकल्पपादपः नलः अर्थिजनस्य ललाटे जाग्रतीम् 'अयम् दरिद्रः भविता' इति वैधसीम् विपिम् दारिद्र्यदरिद्रताम् प्रणीय मृषा न चक्रे।
Summary
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Nala, who belittled the wish-fulfilling trees with his generosity, did not falsify the writing of destiny on the foreheads of supplicants which read, "This person will be poor." Instead, by leading their poverty to a state of poverty itself (i.e., completely destroying it), he made that destiny true in a paradoxical way.
पदच्छेदः
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| अयम् | इदम् (१.१) | this one |
| दरिद्रः | दरिद्र (१.१) | poor |
| भविता | भविता (√भू कर्तरि लुट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | will be |
| इति | इति | thus |
| वैधसीम् | वैधसी (२.१) | created by Brahma |
| विपिम् | विपि (२.१) | the writing |
| ललाटे | ललाट (७.१) | on the forehead |
| अर्थिजनस्य | अर्थिन्–जन (६.१) | of the supplicants |
| जाग्रतीम् | जाग्रत् (√जागृ+शतृ, २.१) | existing |
| मृषा | मृषा | false |
| न | न | not |
| चक्रे | चक्रे (√कृ कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | made |
| अल्पितकल्पपादपः | अल्पित–कल्पपादप (१.१) | he who has belittled the wish-fulfilling trees |
| प्रणीय | प्रणीय (प्र√नी+ल्यप्) | having led to |
| दारिद्रदरिद्रतां | दारिद्र–दरिद्रता (२.१) | the poverty of poverty itself |
| नलः | नल (१.१) | Nala |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | यं | द | रि | द्रो | भ | वि | ते | ति | वै | ध | सीं |
| वि | पिं | ल | ला | टे | ऽर्थि | ज | न | स्य | जा | ग्र | तीम् |
| मृ | षा | न | च | क्रे | ऽल्पि | त | क | ल्प | पा | द | पः |
| प्र | णी | य | दा | रि | द्र | द | रि | द्र | तां | न | लः |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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