तदोजसस्तद्यशसः स्थिताविमौ
वृथेति चित्ते कुरुते यदा यदा ।
तनोति भानोः परिवेषकैतवा-
त्तदा विधिः कुण्डलनां विधोरपि ॥
तदोजसस्तद्यशसः स्थिताविमौ
वृथेति चित्ते कुरुते यदा यदा ।
तनोति भानोः परिवेषकैतवा-
त्तदा विधिः कुण्डलनां विधोरपि ॥
वृथेति चित्ते कुरुते यदा यदा ।
तनोति भानोः परिवेषकैतवा-
त्तदा विधिः कुण्डलनां विधोरपि ॥
अन्वयः
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यदा यदा विधिः 'इमौ तदोजसः तद्यशसः स्थितौ वृथा' इति चित्ते कुरुते, तदा तदा भानोः विधोः अपि परिवेषकैतवात् कुण्डलनाम् तनोति।
Summary
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Whenever the creator Brahma thinks, "In the presence of Nala's splendor and fame, these two (the sun and moon) are useless," he then draws a circle around both the sun and the moon under the pretext of a halo, as if to signify their worthlessness.
पदच्छेदः
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| तदोजसः | तद्–ओजस् (६.१) | of his splendor |
| तद्यशसः | तद्–यशस् (६.१) | of his fame |
| स्थितौ | स्थिति (७.१) | in the presence of |
| इमौ | इदम् (१.२) | these two |
| वृथा | वृथा | in vain |
| इति | इति | thus |
| चित्ते | चित्त (७.१) | in the mind |
| कुरुते | कुरुते (√कृ कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | thinks |
| यदा यदा | यदा यदा | whenever |
| तनोति | तनोति (√तन् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | creates |
| भानोः | भानु (६.१) | of the sun |
| परिवेषकैतवात् | परिवेष–कैतव (५.१) | under the pretext of a halo |
| तदा | तदा | then |
| विधिः | विधि (१.१) | the Creator (Brahma) |
| कुण्डलनाम् | कुण्डलन (२.१) | an encircling |
| विधोः | विधु (६.१) | of the moon |
| अपि | अपि | also |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | दो | ज | स | स्त | द्य | श | सः | स्थि | ता | वि | मौ |
| वृ | थे | ति | चि | त्ते | कु | रु | ते | य | दा | य | दा |
| त | नो | ति | भा | नोः | प | रि | वे | ष | कै | त | वा |
| त्त | दा | वि | धिः | कु | ण्ड | ल | नां | वि | धो | र | पि |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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