श्रीहर्षं कविराजराजिमुकुटालंकारहीरः सुतं
श्रीहीरः सुषुवे जितेन्द्रियचयं मामल्लदेवी च यम् ।
तच्चिन्तामणिमन्त्रचिन्तनफले शृङ्गारभङ्ग्या महा-
काव्ये चारुणि नैषधीयचरिते सर्गोऽयमादिर्गतः ॥
श्रीहर्षं कविराजराजिमुकुटालंकारहीरः सुतं
श्रीहीरः सुषुवे जितेन्द्रियचयं मामल्लदेवी च यम् ।
तच्चिन्तामणिमन्त्रचिन्तनफले शृङ्गारभङ्ग्या महा-
काव्ये चारुणि नैषधीयचरिते सर्गोऽयमादिर्गतः ॥
श्रीहीरः सुषुवे जितेन्द्रियचयं मामल्लदेवी च यम् ।
तच्चिन्तामणिमन्त्रचिन्तनफले शृङ्गारभङ्ग्या महा-
काव्ये चारुणि नैषधीयचरिते सर्गोऽयमादिर्गतः ॥
अन्वयः
AI
कविराजराजिमुकुटालंकारहीरः श्रीहीरः मामल्लदेवी च जितेन्द्रियचयम् यम् श्रीहर्षम् सुतम् सुषुवे, तत्-चिन्तामणिमन्त्रचिन्तनफले शृङ्गारभङ्ग्या चारुणि तस्मिन् नैषधीयचरिते महाकाव्ये अयम् आदिमः सर्गः गतः।
Summary
AI
Srihira, a diamond adorning the crowns of the assembly of kingly poets, and Mamalladevi gave birth to a son, Sriharsha, who had conquered his senses. In his beautiful epic poem, Naishadhiyacharitam—which is the fruit of meditating on the Chintamani mantra and is presented in an erotic style—this first canto has concluded.
पदच्छेदः
AI
| श्रीहर्षम् | श्रीहर्ष (२.१) | Sriharsha |
| कविराजराजिमुकुटालंकारहीरः | कवि–राज–राजि–मुकुट–अलंकार–हीर (१.१) | the diamond adorning the crowns of the assembly of kingly poets |
| सुतम् | सुत (२.१) | son |
| श्रीहीरः | श्रीहीर (१.१) | Srihira |
| सुषुवे | सुषुवे (√षू कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | gave birth to |
| जितेन्द्रियचयम् | जित (√जि+क्त)–इन्द्रिय–चय (२.१) | one who had conquered the host of senses |
| मामल्लदेवी | मामल्लदेवी (१.१) | Mamalladevi |
| च | च | and |
| यम् | यद् (२.१) | whom |
| तच्चिन्तामणिमन्त्रचिन्तनफले | तद्–चिन्तामणि–मन्त्र–चिन्तन–फल (७.१) | in that which is the fruit of meditating on the Chintamani mantra |
| शृङ्गारभङ्ग्या | शृङ्गार–भङ्गी (३.१) | with an erotic style |
| महाकाव्ये | महा–काव्य (७.१) | in the great epic poem |
| चारुणि | चारु (७.१) | in the beautiful |
| नैषधीयचरिते | नैषधीय–चरित (७.१) | in the Naishadhiyacharita |
| सर्गः | सर्ग (१.१) | canto |
| अयम् | इदम् (१.१) | this |
| आदिः | आदि (१.१) | first |
| गतः | गत (√गम्+क्त, १.१) | has concluded |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| श्री | ह | र्षं | क | वि | रा | ज | रा | जि | मु | कु | टा | लं | का | र | ही | रः | सु | तं |
| श्री | ही | रः | सु | षु | वे | जि | ते | न्द्रि | य | च | यं | मा | म | ल्ल | दे | वी | च | यम् |
| त | च्चि | न्ता | म | णि | म | न्त्र | चि | न्त | न | फ | ले | शृ | ङ्गा | र | भ | ङ्ग्या | म | हा |
| का | व्ये | चा | रु | णि | नै | ष | धी | य | च | रि | ते | स | र्गो | ऽय | मा | दि | र्ग | तः |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.