आनन्दजाश्रुभिरनुस्रियमाणमार्गा-
न्प्राक्शोकनिर्गमितनेत्रपयःप्रवाहान् ।
चक्रे स चक्रनिभचङ्क्रमणच्छलेन
नीराजनां जनयतां निजबान्धवानाम् ॥
आनन्दजाश्रुभिरनुस्रियमाणमार्गा-
न्प्राक्शोकनिर्गमितनेत्रपयःप्रवाहान् ।
चक्रे स चक्रनिभचङ्क्रमणच्छलेन
नीराजनां जनयतां निजबान्धवानाम् ॥
न्प्राक्शोकनिर्गमितनेत्रपयःप्रवाहान् ।
चक्रे स चक्रनिभचङ्क्रमणच्छलेन
नीराजनां जनयतां निजबान्धवानाम् ॥
अन्वयः
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सः चक्रनिभचङ्क्रमणच्छलेन, प्राक्शोकनिर्गमितनेत्रपयःप्रवाहान् (ततः) आनन्दजाश्रुभिः अनुस्रियमाणमार्गान्, जनयताम् निजबान्धवानाम् नीराजनाम् चक्रे।
Summary
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By walking around in circles under the pretext of his wheel-like movement, the swan performed a lustration ceremony (nīrājanā) for his kinsmen. Their paths, first marked by streams of tears from sorrow, were then followed by tears of joy.
पदच्छेदः
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| आनन्दजाश्रुभिः | आनन्द–ज–अश्रु (३.३) | by tears born of joy |
| अनुस्रियमाणमार्गान् | अनुस्रियमाण (अनु√सृ+यक्+शानच्)–मार्ग (२.३) | whose paths were being followed |
| प्राक्शोकनिर्गमितनेत्रपयःप्रवाहान् | प्राक्–शोक–निर्गमित (निर्√गम्+णिच्+क्त)–नेत्र–पयस्–प्रवाह (२.३) | whose streams of water from the eyes were first made to flow by sorrow |
| चक्रे | चक्रे (√कृ कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | performed |
| सः | तद् (१.१) | he (the swan) |
| चक्रनिभचङ्क्रमणच्छलेन | चक्र–निभ–चङ्क्रमण–छल (३.१) | under the pretext of a wheel-like movement |
| नीराजनाम् | नीराजन (२.१) | a lustration ceremony |
| जनयताम् | जनयत् (√जन्+णिच्+शतृ, ६.३) | of the producing |
| निजबान्धवानाम् | निज–बान्धव (६.३) | of his own kinsmen |
छन्दः
वसन्ततिलका [१४: तभजजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| आ | न | न्द | जा | श्रु | भि | र | नु | स्रि | य | मा | ण | मा | र्गा |
| न्प्रा | क्शो | क | नि | र्ग | मि | त | ने | त्र | प | यः | प्र | वा | हान् |
| च | क्रे | स | च | क्र | नि | भ | च | ङ्क्र | म | ण | च्छ | ले | न |
| नी | रा | ज | नां | ज | न | य | तां | नि | ज | बा | न्ध | वा | नाम् |
| त | भ | ज | ज | ग | ग | ||||||||
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