मदर्थसंदेशमृणालमन्थरः
प्रियः कियद्दूर इति त्वयोदिते ।
विलोकयन्त्या रुदतोऽथ पक्षिणः
प्रिये स कीदृग्भविता तव क्षणः ॥
मदर्थसंदेशमृणालमन्थरः
प्रियः कियद्दूर इति त्वयोदिते ।
विलोकयन्त्या रुदतोऽथ पक्षिणः
प्रिये स कीदृग्भविता तव क्षणः ॥
प्रियः कियद्दूर इति त्वयोदिते ।
विलोकयन्त्या रुदतोऽथ पक्षिणः
प्रिये स कीदृग्भविता तव क्षणः ॥
अन्वयः
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(हे) प्रिये ! "मत्-अर्थ-संदेश-मृणाल-मन्थरः प्रियः कियत्-दूरः (अस्ति)?" इति त्वया उदिते (सति), अथ रुदतः पक्षिणः विलोकयन्त्याः तव सः क्षणः कीदृक् भविता?
Summary
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Addressing his wife, he laments: "O beloved! When you ask, 'How far away is my dear one, who is slow in bringing the lotus-stalk of a message for me?', and then see other birds weeping, what kind of moment will that be for you?"
पदच्छेदः
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| मत्-अर्थ-संदेश-मृणाल-मन्थरः | मद्–अर्थ–संदेश–मृणाल–मन्थर (१.१) | slow in bringing the lotus-stalk of a message for me |
| प्रियः | प्रिय (१.१) | the beloved one |
| कियत्-दूरः | कियत्–दूर (१.१) | how far |
| इति | इति | thus |
| त्वया | युष्मद् (३.१) | by you |
| उदिते | उदित (√वद्+क्त, ७.१) | when it is said |
| विलोकयन्त्या | विलोकयन्त् (वि√लोक्+शतृ, ६.१) | of you seeing |
| रुदतः | रुदत् (√रुद्+शतृ, २.३) | weeping |
| अथ | अथ | then |
| पक्षिणः | पक्षिन् (२.३) | birds |
| प्रिये | प्रिया (८.१) | O beloved |
| सः | तद् (१.१) | that |
| कीदृक् | कीदृश् (१.१) | of what kind |
| भविता | भविता (√भू कर्तरि लुट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | will be |
| तव | युष्मद् (६.१) | your |
| क्षणः | क्षण (१.१) | moment |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| म | द | र्थ | सं | दे | श | मृ | णा | ल | म | न्थ | रः |
| प्रि | यः | कि | य | द्दू | र | इ | ति | त्व | यो | दि | ते |
| वि | लो | क | य | न्त्या | रु | द | तो | ऽथ | प | क्षि | णः |
| प्रि | ये | स | की | दृ | ग्भ | वि | ता | त | व | क्ष | णः |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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