इतीदृशैस्तं विरचय्य वाङ्मयैः
सचित्रवैलक्ष्यकृपं नृपं खगः ।
दयासमुद्रे स तदाशयेऽतिथी-
चकार कारुण्यरसापगा गिरः ॥
इतीदृशैस्तं विरचय्य वाङ्मयैः
सचित्रवैलक्ष्यकृपं नृपं खगः ।
दयासमुद्रे स तदाशयेऽतिथी-
चकार कारुण्यरसापगा गिरः ॥
सचित्रवैलक्ष्यकृपं नृपं खगः ।
दयासमुद्रे स तदाशयेऽतिथी-
चकार कारुण्यरसापगा गिरः ॥
अन्वयः
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इति ईदृशैः वाक्-मयैः तं नृपं स-चित्र-वैलक्ष्य-कृपं विरचय्य, सः खगः तदाशये दया-समुद्रे कारुण्य-रस-आपगाः गिरः अतिथि-चकार ।
Summary
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Having made the king filled with a strange mix of shame and pity with such words, the bird then made his speeches, which were like rivers of pathos, guests in the ocean of compassion that was the king's heart.
पदच्छेदः
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| इति | इति | Thus |
| ईदृशैः | ईदृश (३.३) | with such |
| तं | तद् (२.१) | that |
| विरचय्य | विरचय्य (वि√रच्+णिच्+ल्यप्) | having made |
| वाक्-मयैः | वाच् (+मयट्, ३.३) | words |
| स-चित्र-वैलक्ष्य-कृपं | सचित्र–वैलक्ष्य–कृप (२.१) | filled with a strange mix of shame and pity |
| नृपं | नृप (२.१) | king |
| खगः | खग (१.१) | the bird |
| दया-समुद्रे | दया–समुद्र (७.१) | in the ocean of compassion |
| सः | तद् (१.१) | he |
| तदाशये | तदाशय (७.१) | in his (the king's) heart |
| अतिथि-चकार | अतिथिचकार (√कृ +च्वि कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | made a guest of |
| कारुण्य-रस-आपगाः | कारुण्य–रस–आपगा (२.३) | rivers of the sentiment of pathos |
| गिरः | गिर् (२.३) | speeches |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| इ | ती | दृ | शै | स्तं | वि | र | च | य्य | वा | ङ्म | यैः |
| स | चि | त्र | वै | ल | क्ष्य | कृ | पं | नृ | पं | ख | गः |
| द | या | स | मु | द्रे | स | त | दा | श | ये | ऽति | थी |
| च | का | र | का | रु | ण्य | र | सा | प | गा | गि | रः |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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