पतत्रिणा तद्रुचिरेण वञ्चितं
श्रियः प्रयान्त्याः प्रविहाय पल्वलम् ।
चलत्पदाम्भोरुहनूपुरोपमा
चुकूज कूले कलहंसमण्डली ॥
पतत्रिणा तद्रुचिरेण वञ्चितं
श्रियः प्रयान्त्याः प्रविहाय पल्वलम् ।
चलत्पदाम्भोरुहनूपुरोपमा
चुकूज कूले कलहंसमण्डली ॥
श्रियः प्रयान्त्याः प्रविहाय पल्वलम् ।
चलत्पदाम्भोरुहनूपुरोपमा
चुकूज कूले कलहंसमण्डली ॥
अन्वयः
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पल्वलं प्रविहाय प्रयान्त्याः श्रियः चलत्-पद-अम्भोरुह-नूपुर-उपमा कलहंस-मण्डली, तत्-रुचिरेण पतत्रिणा वञ्चितं (यथा स्यात् तथा) कूले चुकूज ।
Summary
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On the bank, a flock of swans cackled. Their sound resembled the tinkling of anklets on the moving lotus-feet of the goddess Shri (Fortune), who was now abandoning the pond, deceived by the beauty of that captured bird.
पदच्छेदः
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| पतत्रिणा | पतत्रिन् (३.१) | by the bird |
| तत्-रुचिरेण | तद्–रुचिर (३.१) | by its beauty |
| वञ्चितं | वञ्चित (√वञ्च्+क्त, २.१) | deceived |
| श्रियः | श्री (६.१) | of the goddess Shri (Fortune) |
| प्रयान्त्याः | प्रयान्त् (प्र√या+शतृ, ६.१) | of her who was departing |
| प्रविहाय | प्रविहाय (प्र+वि√हा+ल्यप्) | having abandoned |
| पल्वलम् | पल्वल (२.१) | the pond |
| चलत्-पद-अम्भोरुह-नूपुर-उपमा | चलत्–पद–अम्भोरुह–नूपुर–उपमा (१.१) | whose sound was like the anklets on moving lotus-feet |
| चुकूज | चुकूज (√कूज् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | cackled |
| कूले | कूल (७.१) | on the bank |
| कलहंस-मण्डली | कलहंस–मण्डली (१.१) | a flock of swans |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प | त | त्रि | णा | त | द्रु | चि | रे | ण | व | ञ्चि | तं |
| श्रि | यः | प्र | या | न्त्याः | प्र | वि | हा | य | प | ल्व | लम् |
| च | ल | त्प | दा | म्भो | रु | ह | नू | पु | रो | प | मा |
| चु | कू | ज | कू | ले | क | ल | हं | स | म | ण्ड | ली |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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