ससंभ्रमोत्पातिपतत्कुलाकुलं
सरः प्रपद्योत्कतयाऽनुकम्प्रताम् ।
तमूर्मिलोलैः पतगग्रहान्नृपं
न्यवारयद्वारिरुहैः करैरिव ॥
ससंभ्रमोत्पातिपतत्कुलाकुलं
सरः प्रपद्योत्कतयाऽनुकम्प्रताम् ।
तमूर्मिलोलैः पतगग्रहान्नृपं
न्यवारयद्वारिरुहैः करैरिव ॥
सरः प्रपद्योत्कतयाऽनुकम्प्रताम् ।
तमूर्मिलोलैः पतगग्रहान्नृपं
न्यवारयद्वारिरुहैः करैरिव ॥
अन्वयः
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स-संभ्रम-उत्पाति-पतत्-कुल-आकुलं सरः उत्कतया अनुकम्प्रतां प्रपद्य, ऊर्मि-लोलैः वारिरुहैः करैः इव तं नृपं पतग-ग्रहात् न्यवारयत् ।
Summary
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The pond, agitated by the flocks of birds rising and falling in alarm, became filled with compassion. With its lotuses swaying on the waves like hands, it seemed to dissuade the king from capturing the bird.
पदच्छेदः
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| स-संभ्रम-उत्पाति-पतत्-कुल-आकुलं | ससंभ्रम–उत्पातिन्–पतत्–कुल–आकुल (१.१) | agitated by the flocks of birds rising and falling in alarm |
| सरः | सरस् (१.१) | The lake |
| प्रपद्य | प्रपद्य (प्र√पद्+ल्यप्) | attaining |
| उत्कतया | उत्कता (३.१) | due to its longing/anxiety |
| अनुकम्प्रताम् | अनुकम्प्रता (२.१) | compassion |
| तम् | तद् (२.१) | that |
| ऊर्मि-लोलैः | ऊर्मि–लोल (३.३) | with swaying on the waves |
| पतग-ग्रहात् | पतग–ग्रह (५.१) | from capturing the bird |
| नृपं | नृप (२.१) | king |
| न्यवारयत् | न्यवारयत् (नि√वृ +णिच् कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | dissuaded |
| वारिरुहैः | वारिरुह (३.३) | with lotuses |
| करैः | कर (३.३) | with hands |
| इव | इव | as if |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | सं | भ्र | मो | त्पा | ति | प | त | त्कु | ला | कु | लं |
| स | रः | प्र | प | द्यो | त्क | त | या | ऽनु | क | म्प्र | ताम् |
| त | मू | र्मि | लो | लैः | प | त | ग | ग्र | हा | न्नृ | पं |
| न्य | वा | र | य | द्वा | रि | रु | हैः | क | रै | रि | व |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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