महीमहेन्द्रस्तमवेक्ष्य स क्षणं
शकुन्तमेकान्तमनोविनोदिनम् ।
प्रियावियोगाद्विधुरोऽपि निर्भरं
कुतूहलाक्रान्तमना मनागभूत् ॥
महीमहेन्द्रस्तमवेक्ष्य स क्षणं
शकुन्तमेकान्तमनोविनोदिनम् ।
प्रियावियोगाद्विधुरोऽपि निर्भरं
कुतूहलाक्रान्तमना मनागभूत् ॥
शकुन्तमेकान्तमनोविनोदिनम् ।
प्रियावियोगाद्विधुरोऽपि निर्भरं
कुतूहलाक्रान्तमना मनागभूत् ॥
अन्वयः
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प्रियावियोगात् विधुरः अपि सः महीमहेन्द्रः, एकान्तमनोविनोदिनम् तम् शकुन्तम् क्षणम् अवेक्ष्य, मनाक् निर्भरम् कुतूहलाक्रान्तमनाः अभूत्।
Summary
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Although distressed by the separation from his beloved, that great king of the earth, Nala, after looking for a moment at that bird which was so delightful to the mind in solitude, became intensely seized by a little curiosity.
पदच्छेदः
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| महीमहेन्द्रः | मही–महेन्द्र (१.१) | the great king of the earth |
| तम् | तद् (२.१) | that |
| अवेक्ष्य | अवेक्ष्य (अव√ईक्ष्+ल्यप्) | having seen |
| सः | तद् (१.१) | he |
| क्षणम् | क्षणम् | for a moment |
| शकुन्तम् | शकुन्त (२.१) | bird |
| एकान्तमनोविनोदिनम् | एकान्त–मनस्–विनोदिन् (२.१) | which delights the mind in solitude |
| प्रियावियोगात् | प्रिया–वियोग (५.१) | from separation from his beloved |
| विधुरः | विधुर (१.१) | distressed |
| अपि | अपि | even though |
| निर्भरम् | निर्भरम् | intensely |
| कुतूहलाक्रान्तमनाः | कुतूहल–आक्रान्त–मनस् (१.१) | whose mind was seized by curiosity |
| मनाक् | मनाक् | a little |
| अभूत् | अभूत् (√भू कर्तरि लुङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | became |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| म | ही | म | हे | न्द्र | स्त | म | वे | क्ष्य | स | क्ष | णं |
| श | कु | न्त | मे | का | न्त | म | नो | वि | नो | दि | नम् |
| प्रि | या | वि | यो | गा | द्वि | धु | रो | ऽपि | नि | र्भ | रं |
| कु | तू | ह | ला | क्रा | न्त | म | ना | म | ना | ग | भूत् |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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