प्रकाममादित्यमवाप्य कण्टकैः
करम्बितामोदभरं विवृण्वती ।
धृतस्फुटश्रीगृहविग्रहा दिवा
सरोजिनी यत्प्रभवाप्सरायिता ॥
प्रकाममादित्यमवाप्य कण्टकैः
करम्बितामोदभरं विवृण्वती ।
धृतस्फुटश्रीगृहविग्रहा दिवा
सरोजिनी यत्प्रभवाप्सरायिता ॥
करम्बितामोदभरं विवृण्वती ।
धृतस्फुटश्रीगृहविग्रहा दिवा
सरोजिनी यत्प्रभवाप्सरायिता ॥
अन्वयः
AI
यत्प्रभवा सरोजिनी दिवा प्रकामम् आदित्यम् अवाप्य, कण्टकैः करम्बितम् आमोदभरम् विवृण्वती, धृतस्फुटश्रीगृहविग्रहा सती अप्सरायिता।
Summary
AI
The lotus plant, originating from that lake, behaved like a celestial nymph during the day. Willingly embracing the sun, revealing her abundant fragrance mixed with (the sharpness of) her thorns, she assumed the clear and beautiful form of the abode of Goddess Lakshmi.
पदच्छेदः
AI
| प्रकामम् | प्रकामम् | willingly |
| आदित्यम् | आदित्य (२.१) | the sun |
| अवाप्य | अवाप्य (अव√आप्+ल्यप्) | having obtained |
| कण्टकैः | कण्टक (३.३) | with thorns |
| करम्बितम् | करम्बित (२.१) | mixed with |
| आमोदभरम् | आमोद–भर (२.१) | abundance of fragrance |
| विवृण्वती | विवृण्वत् (वि√वृ+शतृ+ङीप्, १.१) | revealing |
| धृतस्फुटश्रीगृहविग्रहा | धृत–स्फुट–श्री–गृह–विग्रह (१.१) | she who has assumed the clear form of the abode of Lakshmi |
| दिवा | दिवा | by day |
| सरोजिनी | सरोजिनी (१.१) | the lotus plant |
| यत्प्रभवा | यत्प्रभव (१.१) | originating from which (lake) |
| अप्सरायिता | अप्सरायित (√अप्सरस्+क्यङ्+क्त+टाप्, १.१) | behaved like an Apsara |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प्र | का | म | मा | दि | त्य | म | वा | प्य | क | ण्ट | कैः |
| क | र | म्बि | ता | मो | द | भ | रं | वि | वृ | ण्व | ती |
| धृ | त | स्फु | ट | श्री | गृ | ह | वि | ग्र | हा | दि | वा |
| स | रो | जि | नी | य | त्प्र | भ | वा | प्स | रा | यि | ता |
| ज | त | ज | र | ||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.