तरङ्गिणीरङ्कजुषः स्ववल्लभा-
स्तरङ्गरेखा बिभरांबभूव यः ।
दरोद्गतैः कोकनदौघकोरकै-
र्धृतप्रवालाङ्कुरसंचयश्च यः ॥
तरङ्गिणीरङ्कजुषः स्ववल्लभा-
स्तरङ्गरेखा बिभरांबभूव यः ।
दरोद्गतैः कोकनदौघकोरकै-
र्धृतप्रवालाङ्कुरसंचयश्च यः ॥
स्तरङ्गरेखा बिभरांबभूव यः ।
दरोद्गतैः कोकनदौघकोरकै-
र्धृतप्रवालाङ्कुरसंचयश्च यः ॥
अन्वयः
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यः तरङ्गिणीरङ्कजुषः स्ववल्लभाः तरङ्गरेखाः बिभरांबभूव, यः च दरोद्गतैः कोकनदौघकोरकैः धृतप्रवालाङ्कुरसंचयः बभूव।
Summary
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That lake, like an ocean, embraced the lines of waves as its beloved rivers coming to its lap. And, with its slightly emerged buds of red lotuses, it appeared as if it were holding a collection of fresh coral sprouts.
पदच्छेदः
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| तरङ्गिणीरङ्कजुषः | तरङ्गिणी–अङ्क–जुष् (२.३) | resorting to the lap of the river |
| स्ववल्लभाः | स्व–वल्लभा (२.३) | his own beloveds |
| तरङ्गरेखाः | तरङ्ग–रेखा (२.३) | lines of waves |
| बिभरांबभूव | बिभरांबभूव (√भृ कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | bore |
| यः | यद् (१.१) | which (the lake) |
| दरोद्गतैः | दर–उद्गत (३.३) | by slightly emerged |
| कोकनदौघकोरकैः | कोकनद–ओघ–कोरक (३.३) | by the buds of a multitude of red lotuses |
| धृतप्रवालाङ्कुरसंचयः | धृत–प्रवाल–अङ्कुर–संचय (१.१) | one who holds a collection of coral sprouts |
| च | च | and |
| यः | यद् (१.१) | which (the lake) |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | र | ङ्गि | णी | र | ङ्क | जु | षः | स्व | व | ल्ल | भा |
| स्त | र | ङ्ग | रे | खा | बि | भ | रां | ब | भू | व | यः |
| द | रो | द्ग | तैः | को | क | न | दौ | घ | को | र | कै |
| र्धृ | त | प्र | वा | ला | ङ्कु | र | सं | च | य | श्च | यः |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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