अनल्पदग्धारिपुरानलोज्ज्वलैः
निजप्रतापैर्वलयं ज्वलद्भुवः ।
प्रदक्षिणीकृत्य जयाय सृष्टया
रराज नीराजनया स राजघः ॥
अनल्पदग्धारिपुरानलोज्ज्वलैः
निजप्रतापैर्वलयं ज्वलद्भुवः ।
प्रदक्षिणीकृत्य जयाय सृष्टया
रराज नीराजनया स राजघः ॥
निजप्रतापैर्वलयं ज्वलद्भुवः ।
प्रदक्षिणीकृत्य जयाय सृष्टया
रराज नीराजनया स राजघः ॥
अन्वयः
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सः राजघः अनल्प-दग्ध-अरि-पुर-अनल-उज्ज्वलैः निज-प्रतापैः ज्वलत्-भुवः वलयम् प्रदक्षिणीकृत्य, जयाय सृष्टया नीराजनया रराज ।
Summary
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That great king shone, having circumambulated the circle of the blazing earth with his own valor, which was as bright as the fires that had burned countless enemy cities. This act served as a lustration ceremony (Nīrājanā) created for his victory.
पदच्छेदः
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| अनल्पदग्धारिपुरानलोज्ज्वलैः | अनल्प–दग्ध–अरि–पुर–अनल–उज्ज्वल (३.३) | which were as bright as the fires of countless burnt enemy cities |
| निजप्रतापैः | निज–प्रताप (३.३) | with his own valor |
| वलयम् | वलय (२.१) | the circle |
| ज्वलद्भुवः | ज्वलत् (√ज्वल्+शतृ)–भू (६.१) | of the blazing earth |
| प्रदक्षिणीकृत्य | प्रदक्षिणीकृत्य (प्रदक्षिण√कृ+च्वि+ल्यप्) | having circumambulated |
| जयाय | जय (४.१) | for victory |
| सृष्टया | सृष्टि (३.१) | created |
| रराज | रराज (√राज् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | shone |
| नीराजनया | नीराजना (३.१) | by the lustration ceremony |
| सः | तद् (१.१) | He |
| राजघः | राजघ (१.१) | the great king |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | न | ल्प | द | ग्धा | रि | पु | रा | न | लो | ज्ज्व | लैः |
| नि | ज | प्र | ता | पै | र्व | ल | यं | ज्व | ल | द्भु | वः |
| प्र | द | क्षि | णी | कृ | त्य | ज | या | य | सृ | ष्ट | या |
| र | रा | ज | नी | रा | ज | न | या | स | रा | ज | घः |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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