आपृच्छस्व प्रियसखममुं तुङ्गमालिङ्ग्य शैलं
वन्द्यैः पुंसां रघुपतिपदैरङ्कितं मेखलासु ।
काले काले भवति भवता यस्य संयोगमेत्य
स्नेहव्यक्तिश्चिरविरहजं मुञ्चतो बाष्पमुष्णम् ॥
आपृच्छस्व प्रियसखममुं तुङ्गमालिङ्ग्य शैलं
वन्द्यैः पुंसां रघुपतिपदैरङ्कितं मेखलासु ।
काले काले भवति भवता यस्य संयोगमेत्य
स्नेहव्यक्तिश्चिरविरहजं मुञ्चतो बाष्पमुष्णम् ॥
वन्द्यैः पुंसां रघुपतिपदैरङ्कितं मेखलासु ।
काले काले भवति भवता यस्य संयोगमेत्य
स्नेहव्यक्तिश्चिरविरहजं मुञ्चतो बाष्पमुष्णम् ॥
अन्वयः
AI
पुंसां वन्द्यैः रघुपति-पदैः मेखलासु अङ्कितं अमुं तुङ्गं प्रिय-सखं शैलं आलिङ्ग्य आपृच्छस्व। यस्य भवता संयोगम् एत्य काले काले स्नेह-व्यक्तिः चिर-विरह-जं उष्णं बाष्पं मुञ्चतः (इव भवति)।
Summary
AI
The yakṣa asks the cloud to embrace and bid farewell to its dear friend, the lofty Rāmagiri mountain, which bears the sacred footprints of Rāma. At every reunion with the cloud, the mountain shows its affection by shedding warm tears of joy, appearing as water released after a long separation.
सारांश
AI
श्रीराम के चरण चिह्नों से अंकित इस ऊँचे रामगिरि पर्वत का आलिंगन कर इससे विदा लो। चिर विरह के बाद तुम्हारा संयोग प्राप्त होने पर यह पर्वत उष्ण आँसुओं के रूप में अपनी स्नेह-अभिव्यक्ति करता है।
वल्लभदेवः
अमुं शैलं चित्रकूटमालिङ्ग्यापृच्छस्व सोत्कण्ठं [अस्पष्टं मुद्रणम्]ज्योककुरु । यतः प्रियसखमिष्टमित्रम् । मेघानां ह्यद्रयः सुहृदः । ततस्तेषामुदयात् । सखा च गमनकाले ज्योक्क्रियते । कीदृशममुम् । तुङ्गमुन्नतम् । तथा सर्वजनपूज्यैः रामपदै रामपादैर्मेखलासु नितम्बभागेष्वङ्कितं मुद्रितमिति पावनत्वोक्तिः । सखिधर्ममाह | यस्याद्रेः काले काले सर्वस्मिन्समागमममये त्वया सह संयोगमेत्य चिरविरहजमुष्णं बाष्पमूष्माणं त्यजतः स्नेहव्यक्तिर्भवति । यः स्निह्यतीत्यर्थः । पर्वता हि जलदवृष्ट्या स्निग्धा भवन्ति वाष्पं च मुञ्चन्ति । एतदेव महत्त्वं यच्चिरेण सख्यौ दृष्टे बाष्पस्नेहौ जायेते । आपृच्छस्वेत्याङि नुप्रच्छ्योरित्यात्मनेपदम् । प्रियश्चासौ सखा चेति प्रियसखः । राजाहःसखिभ्यष्टच् । संयोगमेत्येति बाष्पमोक्षापेक्षं पौर्वकाख्यं स्नेहक्रियापेक्षं वा ॥
पदच्छेदः
AI
| आपृच्छस्व | आपृच्छस्व (आ√प्रछ् कर्तरि लोट् (आत्मने.) म.पु. एक.) | take leave of |
| प्रियसखम् | प्रिय–सखि (२.१) | dear friend |
| अमुम् | अदस् (२.१) | this |
| तुङ्गम् | तुङ्ग (२.१) | lofty |
| आलिङ्ग्य | आलिङ्ग्य (आ√लिङ्ग्+ल्यप्) | having embraced |
| शैलं | शैल (२.१) | mountain |
| वन्द्यैः | वन्द्य (√वन्द्+यत्, ३.३) | by the venerable |
| पुंसां | पुंस् (६.३) | of men |
| रघुपतिपदैः | रघुपति–पद (३.३) | footprints of Rama |
| अङ्कितं | अङ्कित (√अङ्क्+क्त, २.१) | marked |
| मेखलासु | मेखला (७.३) | on its slopes |
| काले काले | काल (७.१) | time and again |
| भवति | भवति (√भू कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | is |
| भवता | भवत् (३.१) | by you |
| यस्य | यद् (६.१) | whose |
| संयोगम् | संयोग (२.१) | union |
| एत्य | एत्य (आ√इ+ल्यप्) | having reached |
| स्नेहव्यक्तिः | स्नेह–व्यक्ति (१.१) | manifestation of affection |
| चिरविरहजं | चिर–विरह–ज (२.१) | born of long separation |
| मुञ्चतः | मुञ्चत् (√मुच्+शतृ, ६.१) | of you who are shedding |
| बाष्पम् | बाष्प (२.१) | tears (rain) |
| उष्णम् | उष्ण (२.१) | warm |
छन्दः
मन्दाक्रान्ता [१७: मभनततगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| आ | पृ | च्छ | स्व | प्रि | य | स | ख | म | मुं | तु | ङ्ग | मा | लि | ङ्ग्य | शै | लं |
| व | न्द्यैः | पुं | सां | र | घु | प | ति | प | दै | र | ङ्कि | तं | मे | ख | ला | सु |
| का | ले | का | ले | भ | व | ति | भ | व | ता | य | स्य | सं | यो | ग | मे | त्य |
| स्ने | ह | व्य | क्ति | श्चि | र | वि | र | ह | जं | मु | ञ्च | तो | बा | ष्प | मु | ष्णम् |
| म | भ | न | त | त | ग | ग | ||||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.