आधिक्षामां विरहशयने संनिकीर्णैकपार्श्वां
प्राचीमूले तनुमिव कलामात्रशेषां हिमांशोः ।
मत्संयोगः कथमुपनमेत्स्वप्नजोऽपीति निद्रा-
माकाङ्क्षन्तीं नयनसलिलोत्पीडरुद्धावकाशाम् ॥
आधिक्षामां विरहशयने संनिकीर्णैकपार्श्वां
प्राचीमूले तनुमिव कलामात्रशेषां हिमांशोः ।
मत्संयोगः कथमुपनमेत्स्वप्नजोऽपीति निद्रा-
माकाङ्क्षन्तीं नयनसलिलोत्पीडरुद्धावकाशाम् ॥
प्राचीमूले तनुमिव कलामात्रशेषां हिमांशोः ।
मत्संयोगः कथमुपनमेत्स्वप्नजोऽपीति निद्रा-
माकाङ्क्षन्तीं नयनसलिलोत्पीडरुद्धावकाशाम् ॥
अन्वयः
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आधि-क्षामं विरह-शयने संनिकीर्ण-एक-पार्श्वां प्राची-मूले कला-मात्र-शेषां हिमांशोः तनुम् इव (स्थिताम्), मत्-संयोगः स्वप्न-जः अपि कथम् उपनमेत् इति निद्राम् आकाङ्क्षन्तीं नयन-सलिल-उत्पीड-रुद्ध-अवकाशाम् (तां पश्य) ।
Summary
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See her, wasted by anxiety and lying on one side of her bed of separation, resembling the thin crescent of the moon at the eastern horizon. She longs for sleep, hoping for a union with me even in a dream, yet her eyes are flooded with tears, preventing rest.
सारांश
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वह विरह की शय्या पर एक करवट लेटी, चंद्रमा की पतली कला के समान क्षीण हो गई होगी। मिलन के स्वप्न की प्रतीक्षा में वह सोना चाहती होगी, पर आँखों में भरे आँसुओं के कारण उसे नींद भी नहीं आती होगी।
वल्लभदेवः
अन्यच्च कोदृशीं ताम् । आधिक्षामां चित्तपीडाकृशाम् । अत एव यादृशे तादृशे विरहशयने संनिकीर्णं क्षिप्तमेकं पार्श्वं यया । अतश्चामावस्यायां प्राचीमूले पूर्वदिङ्मुखे कलामात्रशेषां हिमांशोश्चन्द्रमसे मूर्तिमिवेत्युपमा । तथा निद्रामभिलषन्तीम् । किमर्थम् । मया सह कथं नाम स्वप्ने समागमो घटेतेति । नयनसलिलोत्पीडेन नेत्राम्बुपूरेण रुद्धावकाशां निवृत्तप्रसराम ॥
पदच्छेदः
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| आधिक्षामाम् | आधि–क्षाम (२.१) | emaciated with mental anguish |
| विरहशयने | विरह–शयन (७.१) | on the couch of separation |
| संनिकीर्णैकपार्श्वाम् | संनिकीर्ण–एक–पार्श्व (२.१) | lying on one side |
| प्राचीमूले | प्राची–मूल (७.१) | in the eastern quarter |
| तनुम् | तनु (२.१) | the thin body |
| इव | इव | like |
| कलामात्रशेषाम् | कला–मात्र–शेष (२.१) | with only a digit remaining |
| हिमांशुः | हिमांशु (६.१) | of the moon |
| मत्संयोगः | मत्–संयोग (१.१) | my union |
| कथम् | कथम् | how |
| उपनमेत् | उपनमेत् (उप√नम् कर्तरि विधिलिङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | might occur |
| स्वप्नजः | स्वप्न–ज (१.१) | born of a dream |
| अपि | अपि | even |
| इति | इति | thus |
| निद्राम् | निद्रा (२.१) | sleep |
| आकाङ्क्षन्तीम् | आकाङ्क्षन्तीम् (आ√काङ्क्ष्+शतृ, २.१) | desiring |
| नयनसलिलोत्पीडरुद्धावकाशाम् | नयन–सलिल–उत्पीड–रुद्ध–अवकाश (२.१) | whose access is blocked by the pressure of tears |
छन्दः
मन्दाक्रान्ता [१७: मभनततगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| आ | धि | क्षा | मां | वि | र | ह | श | य | ने | सं | नि | की | र्णै | क | पा | र्श्वां |
| प्रा | ची | मू | ले | त | नु | मि | व | क | ला | मा | त्र | शे | षां | हि | मां | शोः |
| म | त्सं | यो | गः | क | थ | मु | प | न | मे | त्स्व | प्न | जो | ऽपी | ति | नि | द्रा |
| मा | का | ङ्क्ष | न्तीं | न | य | न | स | लि | लो | त्पी | ड | रु | द्धा | व | का | शाम् |
| म | भ | न | त | त | ग | ग | ||||||||||
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