संतप्तानां त्वमसि शरणं तत्पयोद प्रियायाः
संदेशं मे हर धनपतिक्रोधविश्लेषितस्य ।
गन्तव्या ते वसतिरलका नाम यक्षेश्वराणां
बाह्योद्यानस्थितहरशिरश्चन्द्रिकाधौतहर्म्या ॥
संतप्तानां त्वमसि शरणं तत्पयोद प्रियायाः
संदेशं मे हर धनपतिक्रोधविश्लेषितस्य ।
गन्तव्या ते वसतिरलका नाम यक्षेश्वराणां
बाह्योद्यानस्थितहरशिरश्चन्द्रिकाधौतहर्म्या ॥
संदेशं मे हर धनपतिक्रोधविश्लेषितस्य ।
गन्तव्या ते वसतिरलका नाम यक्षेश्वराणां
बाह्योद्यानस्थितहरशिरश्चन्द्रिकाधौतहर्म्या ॥
अन्वयः
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हे पयोद! त्वं संतप्तानां शरणम् असि, तत् धन-पति-क्रोध-विश्लेषितस्य मे संदेशं प्रियायाः (समीपं) हर। ते यक्ष-ईश्वराणां अलका नाम वसतिः गन्तव्या, बाह्य-उद्यान-स्थित-हर-शिरः-चन्द्रिका-धौत-हर्म्या (सा)।
Summary
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Addressing the cloud as a refuge for the distressed, the yakṣa asks it to carry a message to his beloved, from whom he is separated by Kubera's wrath. Its destination is Alakā, the city of the yakṣa lords, where the palaces are bathed in the moonlight from the crescent on Śiva’s head in the outer gardens.
सारांश
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हे मेघ! तुम विरह की तपन से जलने वालों के शरणदाता हो, इसलिए कुबेर के क्रोध से विलग हुए मेरा संदेश मेरी प्रिया तक पहुँचा दो। तुम्हें यक्षों के निवास स्थान अलकापुरी जाना है, जहाँ के महलों को उद्यान में स्थित शिव के मस्तक की चन्द्रिका धोती रहती है।
वल्लभदेवः
हे पयोद संतप्तानामम्बुदानेन त्वं यदा शरणं त्राणं भवसि तन्ममापि विरहसंतप्तस्य संदेशं वार्तां प्रियायाः सकाशं हर नय प्रापय । धनपतिक्रोधविश्लेषितस्येति संतप्तत्वप्रतिपादनम् । क्व मया गन्तव्यमित्याह । गुह्यकाधिपानां वसतिरलका नाम पुरी ते गन्तव्या यातव्या । न च सा दुर्ज्ञानेत्याह' । बाह्योद्याने कैलासोपवने । बाह्यं च तदुदवानं च । तत्र स्थितो यो हरस्तस्य शिरश्चन्द्रिकया धौतानि हर्म्याणि यत्र सा दिनेऽपि विक्षालितसौधा । त इति कृत्यानां कर्तरि वा ॥
पदच्छेदः
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| संतप्तानां | संतप्त (सम्√तप्+क्त, ६.३) | of the afflicted |
| त्वम् | युष्मद् (१.१) | you |
| असि | असि (√अस् कर्तरि लट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | are |
| शरणं | शरण (१.१) | a refuge |
| तत् | तत् | therefore |
| पयोद | पयोद (८.१) | O cloud |
| प्रियायाः | प्रिया (६.१) | of my beloved |
| संदेशं | संदेश (२.१) | message |
| मे | अस्मद् (६.१) | my |
| हर | हर (√हृ कर्तरि लोट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | carry |
| धनपतिक्रोधविश्लेषितस्य | धनपति–क्रोध–विश्लेषित (६.१) | of me, who has been separated by the anger of the lord of wealth (Kubera) |
| गन्तव्या | गन्तव्य (√गम्+तव्य, १.१) | to be gone to |
| ते | युष्मद् (३.१) | by you |
| वसतिः | वसति (१.१) | the abode |
| अलका | अलका (१.१) | Alaka |
| नाम | नाम | by name |
| यक्षेश्वराणाम् | यक्ष–ईश्वर (६.३) | of the lords of the Yakshas |
| बाह्योद्यानस्थितहरशिरश्चन्द्रिकाधौतहर्म्या | बाह्य–उद्यान–स्थित–हर–शिरस्–चन्द्रिका–धौत–हर्म्य (१.१) | whose mansions are whitened by the moonlight from the crescent on Shiva's head, who is situated in the outer garden |
छन्दः
मन्दाक्रान्ता [१७: मभनततगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| सं | त | प्ता | नां | त्व | म | सि | श | र | णं | त | त्प | यो | द | प्रि | या | याः |
| सं | दे | शं | मे | ह | र | ध | न | प | ति | क्रो | ध | वि | श्ले | षि | त | स्य |
| ग | न्त | व्या | ते | व | स | ति | र | ल | का | ना | म | य | क्षे | श्व | रा | णां |
| बा | ह्यो | द्या | न | स्थि | त | ह | र | शि | र | श्च | न्द्रि | का | धौ | त | ह | र्म्या |
| म | भ | न | त | त | ग | ग | ||||||||||
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