यस्यां यक्षाः सितमणिमयान्येत्य हर्म्यस्थलानि
ज्योतिश्छायाकुसुमरचनान्युत्तमस्त्रीसहायाः ।
आसेवन्ते मधु रतिफलं कल्पवृक्षप्रसूतं
त्वद्गम्भीरध्वनिषु शनकैः पुष्करेष्वाहतेषु ॥
यस्यां यक्षाः सितमणिमयान्येत्य हर्म्यस्थलानि
ज्योतिश्छायाकुसुमरचनान्युत्तमस्त्रीसहायाः ।
आसेवन्ते मधु रतिफलं कल्पवृक्षप्रसूतं
त्वद्गम्भीरध्वनिषु शनकैः पुष्करेष्वाहतेषु ॥
ज्योतिश्छायाकुसुमरचनान्युत्तमस्त्रीसहायाः ।
आसेवन्ते मधु रतिफलं कल्पवृक्षप्रसूतं
त्वद्गम्भीरध्वनिषु शनकैः पुष्करेष्वाहतेषु ॥
अन्वयः
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यस्यां उत्तम-स्त्री-सहायाः यक्षाः ज्योतिः-छाया-कुसुम-रचनानि सित-मणि-मयानि हर्म्य-स्थलानि एत्य, त्वत्-गम्भीर-ध्वनिषु पुष्करेष्ु शनकैः आहतेषु (सत्सु), कल्प-वृक्ष-प्रसूतं रति-फलं मधु आसेवन्ते।
Summary
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There, Yakṣas accompanied by excellent women frequent white-gemmed palace terraces decorated with flower-like patterns of reflected starlight. As your deep thunder sounds like a drum, they enjoy the wine produced by the Kalpavṛkṣa tree, which is the fruit of their love.
सारांश
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जहाँ यक्ष अपनी प्रियतमाओं के साथ ऊँचे मणिमय महलों में कल्पवृक्ष से उत्पन्न मदिरा का सेवन करते हैं और तुम्हारी गंभीर गर्जना वहाँ मृदंग का संगीत उत्पन्न करती है।
वल्लभदेवः
यस्यामलकायां नित्यं वरपुरन्ध्रिसहिता गुह्यकेश्वराः सौधतलान्यागत्य रतिफलं न तु कलहादिजनकं कल्पवृक्षजं मधु रसं सेवन्ते । कीदृशानि स्थलानि । सितमणिमयानि स्फटिकानि । अत एव ज्योतिश्छायास्तारावलिप्रतिबिम्बान्येव कुसुमरचना पुष्पप्रकरो येषु । कदा सेवन्ते । भवत इव गम्भीरो निर्ह्रादो ध्वनिर्येषां तेषु पुष्करेषु वाद्यमुखेष्वाहतेष्वास्फालितेषु सत्सु । तदेतेन दम्पतीनां सदासुखित्वमुक्तम् ॥
पदच्छेदः
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| यस्याम् | यद् (७.१) | In which (city) |
| यक्षाः | यक्ष (१.३) | Yakshas |
| सितमणिमयानि | सित–मणिमय (२.३) | made of white gems |
| एत्य | एत्य (√इ+ल्यप्) | having reached |
| हर्म्यस्थलानि | हर्म्य–स्थल (२.३) | the palace terraces |
| ज्योतिश्छायाकुसुमरचनानि | ज्योतिस्–छाया–कुसुम–रचना (२.३) | having floral designs from the reflection of stars |
| उत्तमस्त्रीसहायाः | उत्तम–स्त्री–सहाय (१.३) | accompanied by excellent women |
| आसेवन्ते | आसेवन्ते (आ√सेव् कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. बहु.) | enjoy |
| मधु | मधु (२.१) | wine |
| रतिफलम् | रति–फल (२.१) | which has love as its fruit |
| कल्पवृक्षप्रसूतम् | कल्पवृक्ष–प्रसूत (√प्रसूत+क्त, २.१) | produced from the wish-fulfilling tree |
| त्वद्गम्भीरध्वनिषु | त्वद्–गम्भीर–ध्वनि (७.३) | to your deep sounds |
| शनकैः | शनकैस् | gently |
| पुष्करेषु | पुष्कर (७.३) | on the drums |
| आहतेषु | आहतेषु (आ√हन्+क्त, ७.३) | while being beaten |
छन्दः
मन्दाक्रान्ता [१७: मभनततगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| य | स्यां | य | क्षाः | सि | त | म | णि | म | या | न्ये | त्य | ह | र्म्य | स्थ | ला | नि |
| ज्यो | ति | श्छा | या | कु | सु | म | र | च | ना | न्यु | त्त | म | स्त्री | स | हा | याः |
| आ | से | व | न्ते | म | धु | र | ति | फ | लं | क | ल्प | वृ | क्ष | प्र | सू | तं |
| त्व | द्ग | म्भी | र | ध्व | नि | षु | श | न | कैः | पु | ष्क | रे | ष्वा | ह | ते | षु |
| म | भ | न | त | त | ग | ग | ||||||||||
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