तस्माद्गच्छेरनुकनखलं शैलराजावतीर्णां
जह्नोः कन्यां सगरतनयस्वर्गसोपानपङ्क्तिम् ।
गौरीवक्त्रभ्रुकुटिरचनां या विहस्येव फेनैः
शम्भोः केशग्रहणमकरोदिन्दुलग्नोर्मिहस्ता ॥
तस्माद्गच्छेरनुकनखलं शैलराजावतीर्णां
जह्नोः कन्यां सगरतनयस्वर्गसोपानपङ्क्तिम् ।
गौरीवक्त्रभ्रुकुटिरचनां या विहस्येव फेनैः
शम्भोः केशग्रहणमकरोदिन्दुलग्नोर्मिहस्ता ॥
जह्नोः कन्यां सगरतनयस्वर्गसोपानपङ्क्तिम् ।
गौरीवक्त्रभ्रुकुटिरचनां या विहस्येव फेनैः
शम्भोः केशग्रहणमकरोदिन्दुलग्नोर्मिहस्ता ॥
अन्वयः
AI
तस्मात् अनु-कनखलं शैल-राज-अवतीर्णां जह्नोः कन्यां सगर-तनय-स्वर्ग-सोपान-पङ्क्तिं गच्छेः, या फेनैः गौरी-वक्त्र-भ्रुकुटि-रचनां विहस्य इव इन्दु-लग्न-ऊर्मि-हस्ता शम्भोः केश-ग्रहणं अकरोत्।
Summary
AI
From there, proceed to the daughter of Jahnu, the Gaṅgā, descending from the Himalayas near Kanakhala, serving as a staircase to heaven for the sons of Sagara. She, with her foam, seems to laugh at Pārvatī's frowning face as she clutches Śiva’s hair with her wave-hands that touch the moon.
सारांश
AI
वहाँ से कनखल के पास हिमालय से उतरी हुई गंगा के पास जाना, जो सगर के पुत्रों के लिए स्वर्ग की सीढ़ी है। वह गंगा अपने झाग रूपी हास्य से पार्वती की भौंहों की भंगिमा का उपहास करती हुई शिव के केशों को अपनी लहरों से पकड़ती है।
वल्लभदेवः
तस्मात्सरस्वतीदेशादनकनखलं कनखलाख्यतीर्थ समोपे हिमवतः प्रभृतां जाह्नवीं यायाः । कीदृशीम । सगरात्मजानां यष्टिसहस्रसंख्यानां स्वर्गार्थं सोपानपङ्क्तिं निःश्रेणिमालाम् । तत्प्राप्तापायत्वात् । ते हि पाताले कपिलेन रोषाद्दग्धा भगीरथावतारितया भागीरथ्याप्लावितभस्मानस्त्रिदिवमापुः । या च देवी भुवमवतरन्ती गौरीवक्त्रभ्रुकुटिरचनां दिण्डीरैरवहस्येव सपत्नीव शंभोः केशग्रहणमकरोदिति युवतिधर्मारोपः । इन्दौ लग्ना ऊर्मय एव हस्ता यस्याः सा । करेण हि केशाकर्षणं क्रियते । मत्संनिधावेवानया केशा गृह्यन्त इति गौर्या भ्रुकुटिबन्धः । केशेषु धारणाद्गङ्गायाः केशग्राहित्वम् । सा हि स्वर्गात्पतन्ती हरेण जटाग्रे धृतेत्यागमः । भ्रूकुटिवद्भ्रुकुटिशब्दः संयोगादिरप्यस्तीति न वृत्तभङ्गः ॥
पदच्छेदः
AI
| तस्मात् | तद् | from there |
| गच्छेः | गच्छेः (√गम् कर्तरि विधिलिङ् (परस्मै.) म.पु. एक.) | you should go |
| अनुकनखलम् | अनु–कनखल | near Kanakhala |
| शैलराजावतीर्णाम् | शैलराज–अवतीर्णा (२.१) | descended from the king of mountains |
| जह्नोः | जह्नु (६.१) | of Jahnu |
| कन्याम् | कन्या (२.१) | the daughter |
| सगरतनयस्वर्गसोपानपङ्क्तिम् | सगर–तनय–स्वर्ग–सोपान–पङ्क्ति (२.१) | the staircase to heaven for the sons of Sagara |
| गौरीवक्त्रभ्रुकुटिरचनाम् | गौरी–वक्त्र–भ्रुकुटि–रचना (२.१) | the formation of a frown on Gauri's face |
| या | यद् (१.१) | who (the Ganga) |
| विहस्य | विहस्य (वि√हस्+ल्यप्) | having laughed at |
| इव | इव | as if |
| फेनैः | फेन (३.३) | with her foam |
| शम्भोः | शम्भु (६.१) | of Shambhu (Shiva) |
| केशग्रहणम् | केश–ग्रहण (२.१) | the seizing of the hair |
| अकरोत् | अकरोत् (√कृ कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | did |
| इन्दुलग्नोर्मिहस्ता | इन्दु–लग्न–ऊर्मि–हस्ता (१.१) | whose wave-hands touched the moon |
छन्दः
मन्दाक्रान्ता [१७: मभनततगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | स्मा | द्ग | च्छे | र | नु | क | न | ख | लं | शै | ल | रा | जा | व | ती | र्णां |
| ज | ह्नोः | क | न्यां | स | ग | र | त | न | य | स्व | र्ग | सो | पा | न | प | ङ्क्तिम् |
| गौ | री | व | क्त्र | भ्रु | कु | टि | र | च | नां | या | वि | ह | स्ये | व | फे | नैः |
| श | म्भोः | के | श | ग्र | ह | ण | म | क | रो | दि | न्दु | ल | ग्नो | र्मि | ह | स्ता |
| म | भ | न | त | त | ग | ग | ||||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.