धूमज्योतिःसलिलमरुतां संनिपातः क्व मेघः
संदेशार्थाः क्व पटुकरणैः प्राणिभिः प्रापणीयाः ।
इत्यौत्सुक्यादपरिगणयन्गुह्यकस्तं ययाचे
कामार्ता हि प्रणयकृपणाश्चेतनाचेतनेषु ॥
धूमज्योतिःसलिलमरुतां संनिपातः क्व मेघः
संदेशार्थाः क्व पटुकरणैः प्राणिभिः प्रापणीयाः ।
इत्यौत्सुक्यादपरिगणयन्गुह्यकस्तं ययाचे
कामार्ता हि प्रणयकृपणाश्चेतनाचेतनेषु ॥
संदेशार्थाः क्व पटुकरणैः प्राणिभिः प्रापणीयाः ।
इत्यौत्सुक्यादपरिगणयन्गुह्यकस्तं ययाचे
कामार्ता हि प्रणयकृपणाश्चेतनाचेतनेषु ॥
अन्वयः
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धूम-ज्योतिः-सलिल-मरुतां संनिपातः मेघः क्व? पटु-करणैः प्राणिभिः प्रापणीयाः संदेश-ार्थाः क्व? इति औत्सुक्यात् अपरिगणयन् गुह्यकः तं ययाचे, हि काम-ार्ताः चेतना-अचेतनेषु प्रणय-कृपणाः (भवन्ति)।
Summary
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A cloud is merely a combination of smoke, light, water, and air, whereas messages require sentient beings with capable senses for delivery. Overlooking this in his eagerness, the yakṣa beseeched the cloud; indeed, those afflicted by love are naturally unable to distinguish between sentient and insentient objects when making a request.
सारांश
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धुआँ, ज्योति, जल और वायु का समूह मेघ कहाँ, और इंद्रियों से समर्थ प्राणियों द्वारा पहुँचाए जाने वाले संदेश कहाँ? व्याकुलता के कारण इस बात पर विचार न करते हुए यक्ष ने मेघ से प्रार्थना की, क्योंकि काम से पीड़ित व्यक्ति चेतन और अचेतन में भेद नहीं कर पाते।
वल्लभदेवः
गुह्यकः पुण्यजन औत्सुक्यादुत्कण्ठावशादित्येवमपरिगणयन्नविमृशंस्तं मेघं ययाचे प्रार्थयत । किमित्याह । क्व मेघः क्व संदेशार्था वार्त्तावस्तूनि । मेघस्तावद्धूमज्योतिःसलिलमरतां समुदायः । धूमादिमयान्यचेतनानि ह्यभ्राणि । संदेशार्थाः पटुकरणैश्चतुरेन्द्रियैः प्राणिभिर्मानवैः प्रापणीया नेतुं शक्याः । न तु निर्बुद्धिभिः । कथं तर्ह्येतदसौ न विमृष्टवानित्याह । यस्माद्ये कामार्ता मदनवागुरापीडितास्ते चेतनाचेतनेषु सिंहपादपादिषु प्रणयकृपणाः प्रार्थनादीना भवन्ति । न हि ते विषयमविषयं वा विवेक्तुं समर्था इति भङ्ग्या कविः स्वदोषं निरस्यति ॥
पदच्छेदः
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| धूमज्योतिःसलिलमरुतां | धूम–ज्योतिस्–सलिल–मरुत् (६.३) | of smoke, light, water, and wind |
| संनिपातः | सम्-नि-पात (१.१) | a combination |
| क्व | क्व | where |
| मेघः | मेघ (१.१) | the cloud |
| संदेशार्थाः | संदेश–अर्थ (१.३) | the contents of a message |
| क्व | क्व | where |
| पटुकरणैः | पटु–करण (३.३) | with capable senses |
| प्राणिभिः | प्राणिन् (३.३) | by living beings |
| प्रापणीयाः | प्रापणीय (प्र√आप्+अनीयर्, १.३) | to be conveyed |
| इति | इति | thus |
| औत्सुक्यात् | औत्सुक्य (५.१) | due to eagerness |
| अपरिगणयन् | अपरिगणयत् (परि√गण्+शतृ, १.१) | not considering |
| गुह्यकः | गुह्यक (१.१) | the Guhyaka (Yaksha) |
| तम् | तद् (२.१) | it |
| ययाचे | ययाचे (√याच् कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | begged |
| कामार्ताः | काम–आर्त (१.३) | those afflicted by love |
| हि | हि | for |
| प्रणयकृपणाः | प्रणय–कृपण (१.३) | are helpless in their entreaties |
| चेतनाचेतनेषु | चेतन–अचेतन (७.३) | towards the sentient and insentient |
छन्दः
मन्दाक्रान्ता [१७: मभनततगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| धू | म | ज्यो | तिः | स | लि | ल | म | रु | तां | सं | नि | पा | तः | क्व | मे | घः |
| सं | दे | शा | र्थाः | क्व | प | टु | क | र | णैः | प्रा | णि | भिः | प्रा | प | णी | याः |
| इ | त्यौ | त्सु | क्या | द | प | रि | ग | ण | य | न्गु | ह्य | क | स्तं | य | या | चे |
| का | मा | र्ता | हि | प्र | ण | य | कृ | प | णा | श्चे | त | ना | चे | त | ने | षु |
| म | भ | न | त | त | ग | ग | ||||||||||
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