प्रत्यासन्ने नभसि दयिताजीवितालम्बनार्थी
जीमूतेन स्वकुशलमयीं हारयिष्यन्प्रवृत्तिम् ।
स प्रत्यग्रैः कुटजकुसुमैः कल्पितार्घाय तस्मै
प्रीतः प्रीतिप्रमुखवचनं स्वागतं व्याजहार ॥
प्रत्यासन्ने नभसि दयिताजीवितालम्बनार्थी
जीमूतेन स्वकुशलमयीं हारयिष्यन्प्रवृत्तिम् ।
स प्रत्यग्रैः कुटजकुसुमैः कल्पितार्घाय तस्मै
प्रीतः प्रीतिप्रमुखवचनं स्वागतं व्याजहार ॥
जीमूतेन स्वकुशलमयीं हारयिष्यन्प्रवृत्तिम् ।
स प्रत्यग्रैः कुटजकुसुमैः कल्पितार्घाय तस्मै
प्रीतः प्रीतिप्रमुखवचनं स्वागतं व्याजहार ॥
अन्वयः
AI
नभसि प्रत्यासन्ने (सति) दयिता-जीविता-आलम्बन-अर्थी (सः) जीमूतेन स्व-कुशल-मयीं प्रवृत्तिं हारयिष्यन् प्रत्यग्रैः कुटज-कुसुमैः कल्पित-अर्घाय तस्मै प्रीतः प्रीति-प्रमुख-वचनं स्वागतं व्याजहार।
Summary
AI
As the month of Śrāvaṇa approached, the yakṣa, wishing to sustain his beloved's life, decided to send news of his welfare through the cloud. He joyfully offered an arghya of fresh kuṭaja flowers and addressed the cloud with a warm welcome and affectionate words.
सारांश
AI
सावन मास निकट आने पर, अपनी प्रियतमा के प्राणों की रक्षा के लिए बादल के माध्यम से अपनी कुशलता का समाचार भेजने के इच्छुक उस यक्ष ने ताजे कुटज के पुष्पों से मेघ को अर्घ्य दिया और प्रसन्न मन से प्रेमपूर्ण वचनों के साथ उसका स्वागत किया।
वल्लभदेवः
ततोऽसौ गुह्यकस्तस्मै मेघाय स्वागतं व्याजहार । शोभनमागतं तेऽत्स्वित्यब्रवीत् । प्रीतिप्रमुखाणि स्नेहपूर्वकाणि वचनानि यत्र स्वागते तद्यथा । भद्रं स्वस्थोऽसि । कुशलं ते सर्वत्र । विश्रम्यताम् । पवित्रीक्रियतामिदं स्थानमिति । कीदृशोऽसौ । जीमूतेन मेघेन स्वकुशलमयीमात्मश्रेयोरूपां प्रवृत्तिं वार्तां हारयिष्यन्नाययिष्यन् । यतोऽसौ दयिताया जीवितालम्बनं प्राणसंधारणमर्थयते। भर्तृकल्याणाधिगमाद्धि प्रियतमानां समाश्वामो जायते । कीदृशाय तस्मै । सरसैः कुटजकुममैः कल्पितार्घाय विहितपूजाय । अत एवासौ प्रीतः । आषाढस्य प्रशदिवस इति' य एवार्थ उक्तः स एव प्रत्यामने नभसीत्यनूदितः । नभाः श्रावणः । यदि वा जलदनिचितत्वात्प्रत्यासन्ने निकटवर्तिनीव नभसि गगन इति व्याख्येयमिति केचित् । गगम एव जीमूतो वार्तां नयति। स हि प्रीतिं कुर्वन्नाययति । प्रीत्या हारयिष्यन्निति णिजुत्पत्तिः । ततो मृद शेषे चेति' चकारात्क्रियार्थायामुपपदे लृट् । प्रवृत्तिं हारयितुं स्वागतं व्याजहारेत्यर्थः । जीमूतेनेति ह्र्यक्रोरन्यतरस्यामिति' यक्षे यथाप्राप्तं कर्तृत्वम् । तस्मा इति क्रियया यमभिप्रति म संप्रदानमिति' संप्रदानवचनम् ॥
पदच्छेदः
AI
| प्रत्यासन्ने | प्रत्यासन्न (प्रति+आ√सद्+क्त, ७.१) | approaching |
| नभसि | नभस् (७.१) | in the month of Shravana |
| दयिताजीवितालम्बनार्थी | दयिता–जीवित–आलम्बन–अर्थिन् (१.१) | desiring the support of his beloved's life |
| जीमूतेन | जीमूत (३.१) | through the cloud |
| स्वकुशलमयीं | स्व–कुशल–मयी (२.१) | full of his own well-being |
| हारयिष्यन् | हारयिष्यत् (√हृ+णिच्+शतृ, १.१) | wishing to send |
| प्रवृत्तिम् | प्रवृत्ति (२.१) | news |
| सः | तद् (१.१) | he |
| प्रत्यग्रैः | प्रति-अग्र (३.३) | with fresh |
| कुटजकुसुमैः | कुटज–कुसुम (३.३) | Kutaja flowers |
| कल्पितार्घाय | कल्पित–अर्घ (४.१) | for whom an offering was prepared |
| तस्मै | तद् (४.१) | to him (the cloud) |
| प्रीतः | प्रीत (√प्री+क्त, १.१) | pleased |
| प्रीतिप्रमुखवचनं | प्रीति–प्रमुख–वचन (२.१) | with words foremost in affection |
| स्वागतं | स्वागत (२.१) | welcome |
| व्याजहार | व्याजहार (वि+आ√हृ कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | spoke |
छन्दः
मन्दाक्रान्ता [१७: मभनततगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प्र | त्या | स | न्ने | न | भ | सि | द | यि | ता | जी | वि | ता | ल | म्ब | ना | र्थी |
| जी | मू | ते | न | स्व | कु | श | ल | म | यीं | हा | र | यि | ष्य | न्प्र | वृ | त्तिम् |
| स | प्र | त्य | ग्रैः | कु | ट | ज | कु | सु | मैः | क | ल्पि | ता | र्घा | य | त | स्मै |
| प्री | तः | प्री | ति | प्र | मु | ख | व | च | नं | स्वा | ग | तं | व्या | ज | हा | र |
| म | भ | न | त | त | ग | ग | ||||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.