तामुत्तीर्य व्रज परिचितभ्रूलताविभ्रमाणां
पक्ष्मोत्क्षेपादुपरिविलसत्कृष्णशारप्रभाणाम् ।
कुन्दक्षेपानुगमधुकरश्रीमुषामात्मबिम्बं
पात्रीकुर्वन्दशपुरवधूनेत्रकौतूहलानाम् ॥
तामुत्तीर्य व्रज परिचितभ्रूलताविभ्रमाणां
पक्ष्मोत्क्षेपादुपरिविलसत्कृष्णशारप्रभाणाम् ।
कुन्दक्षेपानुगमधुकरश्रीमुषामात्मबिम्बं
पात्रीकुर्वन्दशपुरवधूनेत्रकौतूहलानाम् ॥
पक्ष्मोत्क्षेपादुपरिविलसत्कृष्णशारप्रभाणाम् ।
कुन्दक्षेपानुगमधुकरश्रीमुषामात्मबिम्बं
पात्रीकुर्वन्दशपुरवधूनेत्रकौतूहलानाम् ॥
अन्वयः
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ताम् उत्तीर्य परिचित-भ्रू-लता-विभ्रमाणां पक्ष्म-उत्क्षेपाद् उपरि-विलसत्-कृष्ण-शार-प्रभाणां कुन्द-क्षेप-अनुग-मधुकर-श्री-मुषाम् दश-पुर-वधू-नेत्र-कौतूहलानाम् आत्म-बिम्बं पात्री-कुर्वन् व्रज।
Summary
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Crossing that river, proceed while making yourself the object of the curious glances of the women of Daśapura. Their eyes, expert in playful movements of creeper-like brows, flash with dark and white brilliance as they lift their lashes, stealing the beauty of bees following tossed jasmine flowers.
सारांश
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उस नदी को पार कर तुम दशपुर की वधुओं के चंचल नेत्रों के कौतूहल का विषय बनना। उनके नेत्रों की चपलता और भौंहों का विलास ऐसा है मानो कुंद के फूलों पर काले भंवरे मंडरा रहे हों।
वल्लभदेवः
तां चर्मण्वतीमतीत्य दशपुराख्ये नगरे युवतिनयनकौतुकानामात्मानं पात्रीकुर्वस्तासां नेत्रविषयं नयनन्गच्छेः । दशपुरनिकटेन याया यथा तन्नागरिकास्त्वामीक्षेरन्नित्यर्थः । कीदृशानाम् । नागरिकत्वात्परिचिता अभ्यस्ता भ्रूशाखाविलासा येषाम् । तथा त्वदालोकनवशात्पक्ष्मोत्क्षेपेणोपरि विलसन्ती स्फुरन्ती कृपणशारप्रभा येषाम् । अतश्च कुन्दकुसुमस्य यः क्षेपः प्रेरणां तस्यानुगा अनुयायिनो ये भ्रमरास्तेषां श्रियं शोभां मुष्णन्ति यानि तेषाम् । कुन्दानां मितत्वादलीनां च कालत्वात् । यद्यपि कौतूहलविशेषणान्येतानि तथापि वस्तुबलात्तद्वत्तां नेत्राणामिवैते गुणाः ॥
पदच्छेदः
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| ताम् | तद् (२.१) | it (the river) |
| उत्तीर्य | उत्तीर्य (उत्√तॄ+ल्यप्) | having crossed |
| व्रज | व्रज (√व्रज् कर्तरि लोट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | go |
| परिचितभ्रूलताविभ्रमाणाम् | परिचित–भ्रू–लता–विभ्रम (६.३) | of the playful movements of the creeper-like eyebrows which have been learned |
| पक्ष्मोत्क्षेपात् | पक्ष्मन्–उत्क्षेप (५.१) | from the upward movement of the eyelashes |
| उपरिविलसत्कृष्णशारप्रभाणाम् | उपरि–विलसत्–कृष्ण–शार–प्रभा (६.३) | of the glances which have a variegated black and white lustre shining above |
| कुन्दक्षेपानुगमधुकरश्रीमुषाम् | कुन्द–क्षेप–अनुग–मधुकर–श्री–मुष् (६.३) | which steal the beauty of bees following tossed Kunda flowers |
| आत्मबिम्बम् | आत्मन्–बिम्ब (२.१) | your own reflection |
| पात्रीकुर्वन् | पात्रीकुर्वत् (√कृ+शतृ, १.१) | making an object |
| दशपुरवधूनेत्रकौतूहलानाम् | दशपुर–वधू–नेत्र–कौतूहल (६.३) | of the curiosities of the eyes of the women of Dashapura |
छन्दः
मन्दाक्रान्ता [१७: मभनततगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ता | मु | त्ती | र्य | व्र | ज | प | रि | चि | त | भ्रू | ल | ता | वि | भ्र | मा | णां |
| प | क्ष्मो | त्क्षे | पा | दु | प | रि | वि | ल | स | त्कृ | ष्ण | शा | र | प्र | भा | णाम् |
| कु | न्द | क्षे | पा | नु | ग | म | धु | क | र | श्री | मु | षा | मा | त्म | बि | म्बं |
| पा | त्री | कु | र्व | न्द | श | पु | र | व | धू | ने | त्र | कौ | तू | ह | ला | नाम् |
| म | भ | न | त | त | ग | ग | ||||||||||
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