त्वय्यादातुं जलमवनते शार्ङ्गिणो वर्णचौरे
तस्याः सिन्धोः पृथुमपि तनुं दूरभावात्प्रवाहम् ।
प्रेक्षिष्यन्ते गगनगतयो दूरमावर्ज्य दृष्टी-
रेकं मुक्तागुणमिव भुवः स्थूलमध्येन्द्रनीलम् ॥
त्वय्यादातुं जलमवनते शार्ङ्गिणो वर्णचौरे
तस्याः सिन्धोः पृथुमपि तनुं दूरभावात्प्रवाहम् ।
प्रेक्षिष्यन्ते गगनगतयो दूरमावर्ज्य दृष्टी-
रेकं मुक्तागुणमिव भुवः स्थूलमध्येन्द्रनीलम् ॥
तस्याः सिन्धोः पृथुमपि तनुं दूरभावात्प्रवाहम् ।
प्रेक्षिष्यन्ते गगनगतयो दूरमावर्ज्य दृष्टी-
रेकं मुक्तागुणमिव भुवः स्थूलमध्येन्द्रनीलम् ॥
अन्वयः
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शार्ङ्गिणः वर्ण-चौरे त्वयि जलम् आदातुम् अवनते, गगन-गतयः तस्याः सिन्धोः पृथुम् अपि दूर-भावात् तनुं प्रवाहं भुवः एकं मुक्ता-गुणम् इव स्थूल-मध्येन्द्र-नीलम् दूरात् दृष्टीः आवर्ज्य प्रेक्षिष्यन्ते।
Summary
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When you, who steal the dark hue of Lord Viṣṇu, bend down to sip water, the celestial beings will look down from afar. They will see the broad stream of that river appearing slender due to distance, looking like a single strand of pearls on the Earth with a large sapphire at its center.
सारांश
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जब तुम चर्मण्वती नदी का जल पीने के लिए झुकोगे, तब आकाशचारी देवों को वह पतली नदी ऐसी प्रतीत होगी मानो पृथ्वी के गले में मोतियों की माला पहनी हो और उसके बीच में नीलम के रूप में तुम सुशोभित हो।
वल्लभदेवः
त्वयि तोयं ग्रहीतुमवनते लम्बमाने सति तस्याः मिन्धोश्चर्मण्वत्याः प्रवाहं सिताख्या नभश्चराश्चक्षूंषि दूरमत्यर्थमावर्ज्य निक्षिप्य कौतुकाद्द्रक्ष्यन्ति । यतो भुवः स्थूलमध्येन्द्रनीलमेकं मुक्तागुणं मौक्तिकदामेव । स्रोतसो मुक्तागुणनिभत्वादम्बुदस्य च महानीलतुल्यत्वात् । कीदृशं प्रवाहम् । पृथुमपि तनुं विस्तीमपि स्वल्पम् । कुतः । दूरभावाद्विप्रकर्षात् । दूराद्धि महदपि स्वल्पं दृश्यते । अत एव मुक्तागुणसारूप्यम् । त्वयि कीदृशे । सजलत्वात्कृष्णस्य वर्णचौरे नीले । एतेनेन्द्रनीलनिभत्वमुक्तम् ॥
पदच्छेदः
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| त्वयि | युष्मद् (७.१) | you |
| आदातुम् | आदातुम् (आ√दा+तुमुन्) | to take |
| जलम् | जल (२.१) | water |
| अवनते | अवनत (अव√नम्+क्त, ७.१) | when bent down |
| शार्ङ्गिणः | शार्ङ्गिन् (६.१) | of the one with the Sharnga bow (Vishnu) |
| वर्णचौरे | वर्ण–चौर (७.१) | O you who steal the color |
| तस्याः | तद् (६.१) | of that |
| सिन्धोः | सिन्धु (६.१) | of the river |
| पृथुम् | पृथु (२.१) | broad |
| अपि | अपि | even |
| तनुम् | तनु (२.१) | slender |
| दूरभावात् | दूर–भाव (५.१) | due to being far |
| प्रवाहम् | प्रवाह (२.१) | stream |
| प्रेक्षिष्यन्ते | प्रेक्षिष्यन्ते (प्र√ईक्ष् कर्तरि लृट् (आत्मने.) प्र.पु. बहु.) | will see |
| गगनगतयः | गगन–गति (१.३) | the sky-goers (celestials) |
| दूरम् | दूर | from afar |
| आवर्ज्य | आवर्ज्य (आ√वृज्+ल्यप्) | having turned |
| दृष्टीः | दृष्टि (२.३) | their eyes |
| एकम् | एक (२.१) | a single |
| मुक्तागुणम् | मुक्ता–गुण (२.१) | a string of pearls |
| इव | इव | like |
| भुवः | भू (६.१) | of the earth |
| स्थूलमध्येन्द्रनीलम् | स्थूल–मध्य–इन्द्रनील (२.१) | with a large sapphire in the center |
छन्दः
मन्दाक्रान्ता [१७: मभनततगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त्व | य्या | दा | तुं | ज | ल | म | व | न | ते | शा | र्ङ्गि | णो | व | र्ण | चौ | रे |
| त | स्याः | सि | न्धोः | पृ | थु | म | पि | त | नुं | दू | र | भा | वा | त्प्र | वा | हम् |
| प्रे | क्षि | ष्य | न्ते | ग | ग | न | ग | त | यो | दू | र | मा | व | र्ज्य | दृ | ष्टी |
| रे | कं | मु | क्ता | गु | ण | मि | व | भु | वः | स्थू | ल | म | ध्ये | न्द्र | नी | लम् |
| म | भ | न | त | त | ग | ग | ||||||||||
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